कमीशन वसूलने बदली शराब नीति
कमीशन देने से विदेशी शराब कंपनियों के इनकार के बाद एफएल-10ए लाइसेंस से 248 करोड़ रुपए का किया घोटाला पिछली कांग्रेस सरकार में हुए 3200 करोड़ के शराब घोटाले की जांच के दौरान कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। ईओडब्ल्यू ने मंगलवार को इस मामले में 6वीं चार्जशीट पेश की है। इसमें आरोप है कि ब्रांडेड अंग्रेजी शराब कंपनियों ने पिछली सरकार में सक्रिय सिंडीकेट को नगद कमीशन देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने पैसों का लेन-देन एक नंबर में करने की बात कही। तब सिंडीकेट ने विदेशी शराब कंपनियों से कमीशन वसूलने के लिए शराब नीति को ही बदल दिया। उन्होंंने नई व्यवस्था करते हुए एफएल-10ए लाइसेंस लाया। अपने करीबियों की तीन कंपनियों को लाइसेंस दिया। ये कंपनियां विदेशी शराब कंपनियों से शराब खरीदकर 10 प्रतिशत अपना कमीशन जोड़कर सरकार को सप्लाई करती थीं। एक तरह से बिचौलिए का काम करने लगीं। इससे आरोपियों ने सरकार को 248 करोड़ का राजस्व नुकसान पहुंचाकर घोटाला किया। यह पैसा आबकारी मंत्री से लेकर कई प्रभावशाली लोगों को जाता था। इसमें भिलाई के कारोबारी विजय भाटिया की भूमिका मुख्य थी। जो सिंडीकेट के सदस्य आईटीएस अरुणपति त्रिपाठी, रिटायर आईएएस अनिल टुटेजा और कारोबारी अनवर ढेबर के साथ मिलकर काम कर रहा था। विजय भाटिया और संजय मिश्रा ने रिश्तेदारों के नाम से लिया कमीशन प्रमोद साहू की रिपोर्ट पूर्व सीएम के करीबी भिलाई के कारोबारी विजय भाटिया व सीए संजय मिश्रा ने मोटा कमीशन लेने के लिए शराब कंपनियों में डमी डायरेक्टर और कर्मचारी बनाए। इसमें अपने रिश्तेदारों व करीबियों का नाम जोड़कर मोटा कमीशन लिया गया। भाटिया ने 14.21 करोड़ और संजय व उसकी करीबी ने 3.58 करोड़ कमीशन लिया है। ओम सांई कंपनी में भाटिया ने अपनी जगह अपने करीबी टी भुनेश्वर राव, रवि कौरा, सागर अरोरा को कंपनी का डायरेक्टर बनाया। तीन साल में कंपनी को 27 करोड़ का मुनाफा हुआ। इसमें आधी रकम 14.21 करोड़ भाटिया ने खुद रखे। लेकिन यह पैसा खुद के खाते में न लेकर अपने परिचित महक लेखवानी, मयंक गोदवानी, श्रवण लेखवानी, भजनलाल लेखवानी, सागर अरोरा, प्रवीण गोदवानी, कविता अडानी, सरला केशवानी, सुशील कुकरेजा, जुगल अडानी के खाते में लिए हैं। इन पैसों को पत्नी मोनिका, बेटा विशाल और रिश्तेदार अमित सेठ, कपिल, शौर्य गुलाटी व शिल्पा गुलाटी के नाम से निवेश किया गया है। सिंडीकेट जब काम कर रहा था तो अतुल और मुकेश ने पैसा देने में देर की। तब भाटिया ने दुर्ग के तत्कालीन एएसपी संजय ध्रुव से दबाव बनवाया। एएसपी ध्रुव ने क्राइम ब्रांच में दोनों कारोबारियों को घंटों रखकर धमकी दी। उसके बाद ही पैसा मिल पाया। कैबिनेट में नहीं दी गई पूरी जानकारी
ईओडब्ल्यू का आरोप है कि नई शराब नीति को बदलने के लिए कैबिनेट में पूरी जानकारी नहीं दी गई। कैबिनेट नोट में सिर्फ एक लाइन का प्रस्ताव लाया गया था। उसके नियम, वृत्ति भार अन्य चीजों की जानकारी छिपा दी गई थी। यहां तक प्रस्ताव पास होने के पहले ही सिंडीकेट के सदस्य अनवर ढेबर समेत अन्य को वाट्सएप पर पीडीएफ भेज दिया गया था। इसे लीक कर दिया गया था। इस प्रस्ताव में अधिकारियों को दबाव बनवाकर अरुणपति त्रिपाठी ने हस्ताक्षर कराए। इसके गठित कमेटी की भी कभी बैठक नहीं हुई और नई नीति पर कभी चर्चा की गई। सीधे लागू कर दिया गया। यहां तक हर साल एफएल-10 ए के लिए टेंडर होना था। लेकिन तीन साल तक सिर्फ तीन कंपनियों ने ही काम किया। कागजों में हर साल टेंडर प्रक्रिया हुई, लेकिन असलियत में कोई टेंडर में शामिल ही नहीं हुआ। पत्नी, पिता और भाई के नाम से लिया पैसा
सीए संजय मिश्रा ने अपने भाई मनीष मिश्रा और अभिषेक सिंह के नाम से नेक्सजेन पावर इंजिटेक कंपनी बनाई। इस कंपनी में संजय ने अपनी पत्नी वंदना मिश्रा, पिता सुभाष चंद्र, भाई आशीष और अभिषेक ने पत्नी प्रियंका सिंह समेत अन्य को कर्मचारी बताकर पैसा लिया है। डायरेक्ट मनीष को 1.08 करोड़, वंदना को 43.76 लाख, सुभाष चंद्र को 25 लाख, आशीष को 1.01 करोड़, अभिषेक को 56.48 लाख और प्रियंका को 47.42 लाख का भुगतान हुआ है। तीन साल में आरोपियों की कंपनी को 27.08 करोड़ का मुनाफा हुआ है।
कमीशन देने से विदेशी शराब कंपनियों के इनकार के बाद एफएल-10ए लाइसेंस से 248 करोड़ रुपए का किया घोटाला पिछली कांग्रेस सरकार में हुए 3200 करोड़ के शराब घोटाले की जांच के दौरान कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। ईओडब्ल्यू ने मंगलवार को इस मामले में 6वीं चार्जशीट पेश की है। इसमें आरोप है कि ब्रांडेड अंग्रेजी शराब कंपनियों ने पिछली सरकार में सक्रिय सिंडीकेट को नगद कमीशन देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने पैसों का लेन-देन एक नंबर में करने की बात कही। तब सिंडीकेट ने विदेशी शराब कंपनियों से कमीशन वसूलने के लिए शराब नीति को ही बदल दिया। उन्होंंने नई व्यवस्था करते हुए एफएल-10ए लाइसेंस लाया। अपने करीबियों की तीन कंपनियों को लाइसेंस दिया। ये कंपनियां विदेशी शराब कंपनियों से शराब खरीदकर 10 प्रतिशत अपना कमीशन जोड़कर सरकार को सप्लाई करती थीं। एक तरह से बिचौलिए का काम करने लगीं। इससे आरोपियों ने सरकार को 248 करोड़ का राजस्व नुकसान पहुंचाकर घोटाला किया। यह पैसा आबकारी मंत्री से लेकर कई प्रभावशाली लोगों को जाता था। इसमें भिलाई के कारोबारी विजय भाटिया की भूमिका मुख्य थी। जो सिंडीकेट के सदस्य आईटीएस अरुणपति त्रिपाठी, रिटायर आईएएस अनिल टुटेजा और कारोबारी अनवर ढेबर के साथ मिलकर काम कर रहा था। विजय भाटिया और संजय मिश्रा ने रिश्तेदारों के नाम से लिया कमीशन प्रमोद साहू की रिपोर्ट पूर्व सीएम के करीबी भिलाई के कारोबारी विजय भाटिया व सीए संजय मिश्रा ने मोटा कमीशन लेने के लिए शराब कंपनियों में डमी डायरेक्टर और कर्मचारी बनाए। इसमें अपने रिश्तेदारों व करीबियों का नाम जोड़कर मोटा कमीशन लिया गया। भाटिया ने 14.21 करोड़ और संजय व उसकी करीबी ने 3.58 करोड़ कमीशन लिया है। ओम सांई कंपनी में भाटिया ने अपनी जगह अपने करीबी टी भुनेश्वर राव, रवि कौरा, सागर अरोरा को कंपनी का डायरेक्टर बनाया। तीन साल में कंपनी को 27 करोड़ का मुनाफा हुआ। इसमें आधी रकम 14.21 करोड़ भाटिया ने खुद रखे। लेकिन यह पैसा खुद के खाते में न लेकर अपने परिचित महक लेखवानी, मयंक गोदवानी, श्रवण लेखवानी, भजनलाल लेखवानी, सागर अरोरा, प्रवीण गोदवानी, कविता अडानी, सरला केशवानी, सुशील कुकरेजा, जुगल अडानी के खाते में लिए हैं। इन पैसों को पत्नी मोनिका, बेटा विशाल और रिश्तेदार अमित सेठ, कपिल, शौर्य गुलाटी व शिल्पा गुलाटी के नाम से निवेश किया गया है। सिंडीकेट जब काम कर रहा था तो अतुल और मुकेश ने पैसा देने में देर की। तब भाटिया ने दुर्ग के तत्कालीन एएसपी संजय ध्रुव से दबाव बनवाया। एएसपी ध्रुव ने क्राइम ब्रांच में दोनों कारोबारियों को घंटों रखकर धमकी दी। उसके बाद ही पैसा मिल पाया। कैबिनेट में नहीं दी गई पूरी जानकारी
ईओडब्ल्यू का आरोप है कि नई शराब नीति को बदलने के लिए कैबिनेट में पूरी जानकारी नहीं दी गई। कैबिनेट नोट में सिर्फ एक लाइन का प्रस्ताव लाया गया था। उसके नियम, वृत्ति भार अन्य चीजों की जानकारी छिपा दी गई थी। यहां तक प्रस्ताव पास होने के पहले ही सिंडीकेट के सदस्य अनवर ढेबर समेत अन्य को वाट्सएप पर पीडीएफ भेज दिया गया था। इसे लीक कर दिया गया था। इस प्रस्ताव में अधिकारियों को दबाव बनवाकर अरुणपति त्रिपाठी ने हस्ताक्षर कराए। इसके गठित कमेटी की भी कभी बैठक नहीं हुई और नई नीति पर कभी चर्चा की गई। सीधे लागू कर दिया गया। यहां तक हर साल एफएल-10 ए के लिए टेंडर होना था। लेकिन तीन साल तक सिर्फ तीन कंपनियों ने ही काम किया। कागजों में हर साल टेंडर प्रक्रिया हुई, लेकिन असलियत में कोई टेंडर में शामिल ही नहीं हुआ। पत्नी, पिता और भाई के नाम से लिया पैसा
सीए संजय मिश्रा ने अपने भाई मनीष मिश्रा और अभिषेक सिंह के नाम से नेक्सजेन पावर इंजिटेक कंपनी बनाई। इस कंपनी में संजय ने अपनी पत्नी वंदना मिश्रा, पिता सुभाष चंद्र, भाई आशीष और अभिषेक ने पत्नी प्रियंका सिंह समेत अन्य को कर्मचारी बताकर पैसा लिया है। डायरेक्ट मनीष को 1.08 करोड़, वंदना को 43.76 लाख, सुभाष चंद्र को 25 लाख, आशीष को 1.01 करोड़, अभिषेक को 56.48 लाख और प्रियंका को 47.42 लाख का भुगतान हुआ है। तीन साल में आरोपियों की कंपनी को 27.08 करोड़ का मुनाफा हुआ है।