मकर संक्रांति पर लखनऊ में पतंगबाजी, बाजारों में रौनक:नवाबों के दौर में बकरे के खून से बनता था मांझा, अब चाइनीज का चलन
मकर संक्रांति पर लखनऊ में पतंगबाजी, बाजारों में रौनक:नवाबों के दौर में बकरे के खून से बनता था मांझा, अब चाइनीज का चलन
लखनऊ में मकर संक्रांति के मौके पर जमकर पतंगबाजी होती है। पुराने लखनऊ में इसके सबसे अधिक शौकीन हैं। इसमें इंटरनेशनल खिलाड़ियों से लेकर आम लोग तक शामिल हैं। यही कारण है शहर की पतंग बाजारों की रौनक बढ़ गई है। इस साल डिजाइनर पतंगों की मांग इसमें सबसे अधिक है। अद्धी, स्टार, पट्टीदार, प्रिंट कागज, तिरंगा और चांद वाली पतंगों के दाम 8 से 25 रुपए है। 100 से 1 हजार रुपए तक में मांझा भरी चरखी मिल रही है। दरअसल, लखनऊ में पतंगबाजी का शौक नवाबों के जमाने से है। उस समय दीपावली के दूसरे दिन पतंगबाजी होती थी। मकर संक्रांति पर गुजरात और राजस्थान से आए लोगों ने पतंगबाजी शुरू की थी। धीरे-धीरे लखनऊ के लोग भी मकर संक्रांति पर पतंगबाजी करने लगे। लखनऊ में पतंगबाजी कब और कैसे शुरू हुई इसकी जानकारी के लिए भास्कर रिपोर्टर ने पतंग के शौकीनों और दुकानदारों से बात की तो यह जानकारी मिली। पतंग के शौकीनों ने बताया कि पहले चावल, बकरे खून और लोहे के बुरादे से मांझा तैयार होता था। अब चाइनीज मांझे का चलन बढ़ा है, जो खतरनाक होता है। उन लोगों ने पतंगबाजी में चाइनीज मांझे का प्रयोग नहीं करने की अपील की है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट... पहले दीपावली के दूसरे दिन होती थी पतंगबाजी लखनऊ में गंगा जमुनी तहजीब के तहत दीपावली के दूसरे दिन परवा पर दुकानें बंद होने की बहुत पुरानी परंपरा है। यह परंपरा नवाबों के समय से चली आ रही है। इस दिन नवाब सभी लोगों के साथ मिलकर गोमती नदी के किनारे पतंगबाजी करते थे। नदी के किनारे ही पकवान बनते थे। लोग पकवान का स्वाद लेते हुए पतंगबाजी का आनंद उठाते थे। इसे जमघट नाम दिया गया था। जब भीड़ बढ़ी तो लोग अपनी-अपनी छतों से पतंग उठाने लगे। मकर संक्रांति को लखनऊ में हुआ पतंग का शौक 76 साल के पतंगबाज अमरनाथ कौल बताते हैं कि मकर संक्रांति का पर्व गुजरात और राजस्थान के लोगों से यहां आया है। गुजरात और राजस्थान के लोग मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाते थे। उन लोगों को देखकर शहर के लोग भी इस दिन पतंगबाजी करने लगे। उनमें से एक मैं भी हूं। मेरे पास पतंगबाजी की इंडिया लेवल की 8 ट्राफियां हैं। बकरे के खून से बनाया गया मांझा अमरनाथ कौल बताते हैं कि नवाबों के समय में चीनी व्यापारी सिल्क का कपड़ा बेचने के लिए लखनऊ में आते थे। उस समय सिल्क के सामान की डिमांड बहुत थी। इसी दौरान व्यापारियों ने नवाब को सिल्क की पतंग दी। नवाब ने पतंग उड़ाई तो उन्हें मजा आया धीरे-धीरे इसमें पेंच लड़ाया जाने लगा, लेकिन इस दौरान धागा कट जाता था। तब किसी बुजुर्ग के बताने पर चावल, बकरे का खून और उसमें लोहे का बुरादा डालकर धागे पर लगाया गया। ऐसा करके पहला मांझा तैयार हुआ। इस तरह तैयार मांझे से पेंच लगाने में मजा आने लगा। इसके बाद लोहे की जगह शीशा आया। इस बीच पतंग भी सिल्क की जगह कागज की हो गई। धीमे-धीमे लखनऊ में पेच भी डेवलप की गई। लोग बोले लखनऊ की पतंगबाजी आपस में जोड़ती है अनूप गोयल ने बताया कि लखनऊ की टीम पतंगबाजी के लिए कहीं पर भी जाती है। चैंपियनशिप जीत कर आती है। नवाब आगा, जफर आगा सहित अन्य बड़े खिलाड़ी यहां से रहे हैं। लखनऊ की पतंगबाजी में खास बात यह है कि यह लोगों को जोड़ती है। वह बताते हैं कि एक बार सूखा पड़ा तो पतंग के नीचे सिक्का, नोट और चांदी का सिक्का लगाकर काटी जाती थी, जिससे पतंग लूटने पर लोगों को मदद मिलती थी। इस दौरान एक पतंग जानबूझ कर काटी जाती थी। आजादी के पहले का था वायरलेस साइमन गो बैक के नारे लगाकर कैसरबाग बरादरी में अधिवेशन के समय गिराई गई थी, लेकिन अंग्रेज पता नहीं कर पाते थे कि कौन पतंग उड़ा रहा था। उस समय यह वायरलेस मैसेज का काम करता था। अभी यहां मांझे पर चीनी मांझे के चलते ग्रहण लग गया गया है। पतंग के शौक पर आंख, हाथ और सिर का कॉम्बिनेशन होता है। हम लोग फिट हैं, देखिए 76 साल की उम्र में भी। हरदेव सिंह ने कहा कि पतंग लड़ाने का काम भाई चारा से होता है। दो टीम में हम लीग खेलते हैं। कई सालों से हम लोग शौकिया खेल रहे हैं। इसमें टाइमपास के साथ में खेल भी हो रहा है। शहर में 100 रुपए से चरखी और 8 रुपए से पतंग की शुरू हो रही कीमत लखनऊ में 100 रुपए से चरखी की कीमत की शुरुआत हो रही है। इसकी अधिकतम कीमत 1 हजार रुपए तक है। पतंग 8 रुपए से लेकर 25 रुपए तक हैं। दुकानदार हाजी सुबराती बताते हैं कि नवाब वजीर असफ-उद-दौला के दौर में लखनऊ की पहचान कहा जाने वाला रूमी दरवाजा बना। शानदार इमारतें बनवाने के अलावा नवाब को पतंग उड़ाने का भी शौक था। वह 'झुल-झुल पतंग' उड़ाते थे, जिसमें सोना-चांदी जड़े रहते थे। दीपावली पर खासतौर से वे झुल-झुल पतंग उड़ाते थे। पतंग कट कर जिस किसी के घर में गिरती, उसके परिवार की दीपावली का खर्च निकल जाता था। पतंग लूटने वाले को 5 रुपए इनाम मिलता था। अवध क्षेत्र में पतंगबाजी की शुरुआत भी नवाब असफ-उद-दौला ने की थी। समय के साथ सिर्फ एक चीज ही बदली है। अब दिवाली की अगली सुबह लखनऊ में पतंगें उड़ाई जाती हैं।
लखनऊ में मकर संक्रांति के मौके पर जमकर पतंगबाजी होती है। पुराने लखनऊ में इसके सबसे अधिक शौकीन हैं। इसमें इंटरनेशनल खिलाड़ियों से लेकर आम लोग तक शामिल हैं। यही कारण है शहर की पतंग बाजारों की रौनक बढ़ गई है। इस साल डिजाइनर पतंगों की मांग इसमें सबसे अधिक है। अद्धी, स्टार, पट्टीदार, प्रिंट कागज, तिरंगा और चांद वाली पतंगों के दाम 8 से 25 रुपए है। 100 से 1 हजार रुपए तक में मांझा भरी चरखी मिल रही है। दरअसल, लखनऊ में पतंगबाजी का शौक नवाबों के जमाने से है। उस समय दीपावली के दूसरे दिन पतंगबाजी होती थी। मकर संक्रांति पर गुजरात और राजस्थान से आए लोगों ने पतंगबाजी शुरू की थी। धीरे-धीरे लखनऊ के लोग भी मकर संक्रांति पर पतंगबाजी करने लगे। लखनऊ में पतंगबाजी कब और कैसे शुरू हुई इसकी जानकारी के लिए भास्कर रिपोर्टर ने पतंग के शौकीनों और दुकानदारों से बात की तो यह जानकारी मिली। पतंग के शौकीनों ने बताया कि पहले चावल, बकरे खून और लोहे के बुरादे से मांझा तैयार होता था। अब चाइनीज मांझे का चलन बढ़ा है, जो खतरनाक होता है। उन लोगों ने पतंगबाजी में चाइनीज मांझे का प्रयोग नहीं करने की अपील की है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट... पहले दीपावली के दूसरे दिन होती थी पतंगबाजी लखनऊ में गंगा जमुनी तहजीब के तहत दीपावली के दूसरे दिन परवा पर दुकानें बंद होने की बहुत पुरानी परंपरा है। यह परंपरा नवाबों के समय से चली आ रही है। इस दिन नवाब सभी लोगों के साथ मिलकर गोमती नदी के किनारे पतंगबाजी करते थे। नदी के किनारे ही पकवान बनते थे। लोग पकवान का स्वाद लेते हुए पतंगबाजी का आनंद उठाते थे। इसे जमघट नाम दिया गया था। जब भीड़ बढ़ी तो लोग अपनी-अपनी छतों से पतंग उठाने लगे। मकर संक्रांति को लखनऊ में हुआ पतंग का शौक 76 साल के पतंगबाज अमरनाथ कौल बताते हैं कि मकर संक्रांति का पर्व गुजरात और राजस्थान के लोगों से यहां आया है। गुजरात और राजस्थान के लोग मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाते थे। उन लोगों को देखकर शहर के लोग भी इस दिन पतंगबाजी करने लगे। उनमें से एक मैं भी हूं। मेरे पास पतंगबाजी की इंडिया लेवल की 8 ट्राफियां हैं। बकरे के खून से बनाया गया मांझा अमरनाथ कौल बताते हैं कि नवाबों के समय में चीनी व्यापारी सिल्क का कपड़ा बेचने के लिए लखनऊ में आते थे। उस समय सिल्क के सामान की डिमांड बहुत थी। इसी दौरान व्यापारियों ने नवाब को सिल्क की पतंग दी। नवाब ने पतंग उड़ाई तो उन्हें मजा आया धीरे-धीरे इसमें पेंच लड़ाया जाने लगा, लेकिन इस दौरान धागा कट जाता था। तब किसी बुजुर्ग के बताने पर चावल, बकरे का खून और उसमें लोहे का बुरादा डालकर धागे पर लगाया गया। ऐसा करके पहला मांझा तैयार हुआ। इस तरह तैयार मांझे से पेंच लगाने में मजा आने लगा। इसके बाद लोहे की जगह शीशा आया। इस बीच पतंग भी सिल्क की जगह कागज की हो गई। धीमे-धीमे लखनऊ में पेच भी डेवलप की गई। लोग बोले लखनऊ की पतंगबाजी आपस में जोड़ती है अनूप गोयल ने बताया कि लखनऊ की टीम पतंगबाजी के लिए कहीं पर भी जाती है। चैंपियनशिप जीत कर आती है। नवाब आगा, जफर आगा सहित अन्य बड़े खिलाड़ी यहां से रहे हैं। लखनऊ की पतंगबाजी में खास बात यह है कि यह लोगों को जोड़ती है। वह बताते हैं कि एक बार सूखा पड़ा तो पतंग के नीचे सिक्का, नोट और चांदी का सिक्का लगाकर काटी जाती थी, जिससे पतंग लूटने पर लोगों को मदद मिलती थी। इस दौरान एक पतंग जानबूझ कर काटी जाती थी। आजादी के पहले का था वायरलेस साइमन गो बैक के नारे लगाकर कैसरबाग बरादरी में अधिवेशन के समय गिराई गई थी, लेकिन अंग्रेज पता नहीं कर पाते थे कि कौन पतंग उड़ा रहा था। उस समय यह वायरलेस मैसेज का काम करता था। अभी यहां मांझे पर चीनी मांझे के चलते ग्रहण लग गया गया है। पतंग के शौक पर आंख, हाथ और सिर का कॉम्बिनेशन होता है। हम लोग फिट हैं, देखिए 76 साल की उम्र में भी। हरदेव सिंह ने कहा कि पतंग लड़ाने का काम भाई चारा से होता है। दो टीम में हम लीग खेलते हैं। कई सालों से हम लोग शौकिया खेल रहे हैं। इसमें टाइमपास के साथ में खेल भी हो रहा है। शहर में 100 रुपए से चरखी और 8 रुपए से पतंग की शुरू हो रही कीमत लखनऊ में 100 रुपए से चरखी की कीमत की शुरुआत हो रही है। इसकी अधिकतम कीमत 1 हजार रुपए तक है। पतंग 8 रुपए से लेकर 25 रुपए तक हैं। दुकानदार हाजी सुबराती बताते हैं कि नवाब वजीर असफ-उद-दौला के दौर में लखनऊ की पहचान कहा जाने वाला रूमी दरवाजा बना। शानदार इमारतें बनवाने के अलावा नवाब को पतंग उड़ाने का भी शौक था। वह 'झुल-झुल पतंग' उड़ाते थे, जिसमें सोना-चांदी जड़े रहते थे। दीपावली पर खासतौर से वे झुल-झुल पतंग उड़ाते थे। पतंग कट कर जिस किसी के घर में गिरती, उसके परिवार की दीपावली का खर्च निकल जाता था। पतंग लूटने वाले को 5 रुपए इनाम मिलता था। अवध क्षेत्र में पतंगबाजी की शुरुआत भी नवाब असफ-उद-दौला ने की थी। समय के साथ सिर्फ एक चीज ही बदली है। अब दिवाली की अगली सुबह लखनऊ में पतंगें उड़ाई जाती हैं।