कैंसर, हार्ट अटैक की वजह राजस्थान की जहरीली हवा:हर व्यक्ति के फेफड़ों में जा रहा आधा ग्राम जहर; जयपुर, जोधपुर, कोटा और अलवर सबसे खतरनाक

राजस्थान में हवा सुधारने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने 2019-20 में 19 हजार करोड़ रुपए का 'क्लीन एयर एक्शन प्लान' (NACP) लागू किया। लक्ष्य था PM10 और PM2.5 (धूल जैसे बेहद बारीक कण) में 20 से 40 प्रतिशत तक कमी लाना। छह साल बाद भी प्रदेश में हालात जस के तस हैं। NACP में शामिल राजधानी जयपुर, जोधपुर, कोटा और अलवर जैसे बड़े शहरों में हवा खराब है। स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (RSPCB) के तीन साल के डेटा से साफ है कि 581 करोड़ खर्च करने के बाद भी जिन शहरों पर सबसे ज्यादा फोकस था, वहीं सुधार सबसे कम दिख रहा है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… प्रदूषण बोर्ड के 2023-2025 के औसत PM2.5 डेटा के मुताबिक, जयपुर में यह स्तर करीब 53 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। इसका मतलब यहां रहने वाला हर व्यक्ति साल में करीब 0.39 ग्राम जहरीले कण सांस के साथ अंदर ले रहा है। अलवर में औसत PM2.5 लगभग 49 माइक्रोग्राम रहा, जो सालाना 0.36 ग्राम प्रदूषण के बराबर है। अजमेर में यह 62 माइक्रोग्राम है, यानी साल में 0.45 ग्राम जहर फेफड़ों में पहुंच रहा है। जोधपुर में औसत 58 माइक्रोग्राम (0.42 ग्राम) और कोटा में 60 माइक्रोग्राम (0.44 ग्राम) है। बोर्ड के डेटा और मेडिकल स्टैंडर्ड के मुताबिक, राजस्थान के शहरों में रहने वाला हर व्यक्ति साल में औसतन 0.4 से 0.5 ग्राम जहरीले कण अपने फेफड़ों में भर रहा है, यानी हर साल आधा ग्राम जहर। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि सीधे खून में घुस जाते हैं और सालों बाद दिल, फेफड़े और मस्तिष्क पर असर दिखाते हैं। डराने वाली बात यह है कि इसमें PM10, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और अन्य भारी कण शामिल ही नहीं हैं। ये कैलकुलेशन RSPCB के 2023–2025 के PM2.5 डेटा और मेडिकल स्टैंडर्ड (20 क्यूबिक मीटर हवा/दिन) पर आधारित है। राष्ट्रीय मानक से भी 3-4 गुना ज्यादा जहरीली हवा PM2.5 के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का सुरक्षित मानक सिर्फ 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है, जबकि भारत का राष्ट्रीय मानक 40 माइक्रोग्राम तय किया गया है। इसके उलट राजस्थान के बड़े शहरों में पीक महीनों में PM2.5 का स्तर 120 से 180 माइक्रोग्राम तक पहुंच रहा है। यानी हम भारत के मानक से भी 3-4 गुना और WHO के मानक से 9-15 गुना ज्यादा जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इतनी प्रदूषित हवा में लंबे समय तक रहना हार्ट अटैक, स्ट्रोक, अस्थमा और फेफड़ों का संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ा देता है। जनवरी जैसे महीनों में इसका असर अस्पतालों की OPD में साफ दिखता है, जहां सांस और एलर्जी से जुड़े मरीज तेजी से बढ़ते हैं। NCAP फंड का हिसाब-किताब अभी 96 स्टेशन, 15 और लगाने की तैयारी राजस्थान में फिलहाल 96 AQI स्टेशन काम कर रहे हैं। इनमें 47 ऑटोमैटिक और 49 मैनुअल हैं। इसके बावजूद बड़े शहरों में प्रदूषण की रियल-टाइम तस्वीर अब भी अधूरी मानी जा रही है। इसी वजह से बोर्ड अब 15 नए AQI स्टेशन लगाने की तैयारी कर रहा है। इसके अंतर्गत जयपुर में 4, अलवर, खैरथल, कोटा और डीग में एक-एक स्टेशन लगाए जाएंगे। इसके अलावा कोटपूतली, उदयपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, किशनगढ़ (अजमेर), ब्यावर और सलूंबर में भी एक-एक स्टेशन का प्लान है। बोर्ड का दावा है कि इससे निगरानी बेहतर होगी और ज्यादा सटीक डेटा मिलेगा। 60% खराब AQI का कारण रोड डस्ट RSPCB के मेंबर सेक्रेट्री कपिल चंद्रावल के मुताबिक, राजस्थान के बड़े शहरों में खराब हवा के पीछे फैक्ट्री या वाहनों के धुएं से भी बड़ा कारण सड़कों की धूल और निर्माण कार्य हैं। बोर्ड के सर्वे बताते हैं कि खराब AQI का करीब 60 से 65 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ रोड डस्ट और कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी से आ रहा है। जहां सड़कें टूटी हुई हैं, मिट्टी खुली पड़ी है, निर्माण साइट्स बिना कवर चल रही हैं और पानी का छिड़काव नहीं हो रहा, वहीं सबसे ज्यादा जहरीले कण हवा में उड़ रहे हैं। बोर्ड के मुताबिक, करीब 20 प्रतिशत प्रदूषण वाहनों से, 10 प्रतिशत औद्योगिक इकाइयों से और बाकी कचरा जलाने, खुले प्लॉट और ईंट भट्टों से आता है। यानी हवा साफ करने की असली चाबी नगर निगम, PWD और विकास प्राधिकरण के हाथ में है। अगर सड़कें समय पर साफ हों, निर्माण साइट्स पर कवरिंग हो और जुर्माना वसूल हो, तो AQI में आधे से ज्यादा सुधार यहीं से आ सकता है। हकीकत यह है कि मशीन से झाड़ू, पानी का छिड़काव और साइट मॉनिटरिंग ज्यादातर फाइलों में ही सिमटी हुई है। अधिकारी बोले- सुधार आया, आंकड़े जस के तस बोर्ड के अधिकारी भले ही ‘धीरे-धीरे सुधार’ की बात कर रहे हों, लेकिन उनके अपने आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। तीन साल के डेटा में जयपुर, जोधपुर, अजमेर, अलवर और कोटा जैसे शहरों में AQI और PM2.5 अब भी राष्ट्रीय मानक से कई गुना ऊपर है। न कोई स्थायी गिरावट दिखती है, न कोई ऐसा ट्रेंड जो बताए कि हालात सच में सुधर रहे हैं। बोर्ड के सालाना औसत आंकड़े बताते हैं कि जिन शहरों में 2023 में हवा 'खराब' श्रेणी में थी, वे 2025 में भी उसी श्रेणी से बाहर नहीं निकल पाए। कुछ महीनों में अस्थायी गिरावट जरूर दिखती है, लेकिन सालाना औसत में हालात लगभग जस के तस बने हुए हैं। हर विभाग की अपनी प्राथमिकता है और जिम्मेदारी दूसरे विभागों पर डाल दी जाती है। यहीं पूरी चेन टूट जाती है। एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि हम नोटिस भेज देते हैं, लेकिन अमल करवाने वाला कोई और होता है। ऐसे में फाइलें घूमती रहती हैं और कोई ठोस कार्रवाई हो ही नहीं पाती। हालांकि अब सख्ती की है, लेकिन अभी भी काफी सुधार की गुंजाइश है। RSPCB के मेंबर सेक्रटरी कपिल चंद्रावल से पूछा कि तीन साल में करोड़ों खर्च होने के बाद भी PM2.5 क्यों नहीं घटा तो उनका जवाब था कि यह दीर्घकालिक और क्षेत्रीय प्रदूषण है, जिस पर मौसमी और भौगोलिक कारकों का असर पड़ता है। AQI स्टेशनों का नियमित रख-रखाव होता है। लेकिन मानसरोवर, रीको और मुरलीपुरा जैसे इलाकों को हाई-रिस्क जोन घोषित क्यों नहीं किया गया, इस पर कोई जवाब नहीं मिला। कि

कैंसर, हार्ट अटैक की वजह राजस्थान की जहरीली हवा:हर व्यक्ति के फेफड़ों में जा रहा आधा ग्राम जहर; जयपुर, जोधपुर, कोटा और अलवर सबसे खतरनाक
राजस्थान में हवा सुधारने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने 2019-20 में 19 हजार करोड़ रुपए का 'क्लीन एयर एक्शन प्लान' (NACP) लागू किया। लक्ष्य था PM10 और PM2.5 (धूल जैसे बेहद बारीक कण) में 20 से 40 प्रतिशत तक कमी लाना। छह साल बाद भी प्रदेश में हालात जस के तस हैं। NACP में शामिल राजधानी जयपुर, जोधपुर, कोटा और अलवर जैसे बड़े शहरों में हवा खराब है। स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (RSPCB) के तीन साल के डेटा से साफ है कि 581 करोड़ खर्च करने के बाद भी जिन शहरों पर सबसे ज्यादा फोकस था, वहीं सुधार सबसे कम दिख रहा है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… प्रदूषण बोर्ड के 2023-2025 के औसत PM2.5 डेटा के मुताबिक, जयपुर में यह स्तर करीब 53 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। इसका मतलब यहां रहने वाला हर व्यक्ति साल में करीब 0.39 ग्राम जहरीले कण सांस के साथ अंदर ले रहा है। अलवर में औसत PM2.5 लगभग 49 माइक्रोग्राम रहा, जो सालाना 0.36 ग्राम प्रदूषण के बराबर है। अजमेर में यह 62 माइक्रोग्राम है, यानी साल में 0.45 ग्राम जहर फेफड़ों में पहुंच रहा है। जोधपुर में औसत 58 माइक्रोग्राम (0.42 ग्राम) और कोटा में 60 माइक्रोग्राम (0.44 ग्राम) है। बोर्ड के डेटा और मेडिकल स्टैंडर्ड के मुताबिक, राजस्थान के शहरों में रहने वाला हर व्यक्ति साल में औसतन 0.4 से 0.5 ग्राम जहरीले कण अपने फेफड़ों में भर रहा है, यानी हर साल आधा ग्राम जहर। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि सीधे खून में घुस जाते हैं और सालों बाद दिल, फेफड़े और मस्तिष्क पर असर दिखाते हैं। डराने वाली बात यह है कि इसमें PM10, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और अन्य भारी कण शामिल ही नहीं हैं। ये कैलकुलेशन RSPCB के 2023–2025 के PM2.5 डेटा और मेडिकल स्टैंडर्ड (20 क्यूबिक मीटर हवा/दिन) पर आधारित है। राष्ट्रीय मानक से भी 3-4 गुना ज्यादा जहरीली हवा PM2.5 के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का सुरक्षित मानक सिर्फ 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है, जबकि भारत का राष्ट्रीय मानक 40 माइक्रोग्राम तय किया गया है। इसके उलट राजस्थान के बड़े शहरों में पीक महीनों में PM2.5 का स्तर 120 से 180 माइक्रोग्राम तक पहुंच रहा है। यानी हम भारत के मानक से भी 3-4 गुना और WHO के मानक से 9-15 गुना ज्यादा जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इतनी प्रदूषित हवा में लंबे समय तक रहना हार्ट अटैक, स्ट्रोक, अस्थमा और फेफड़ों का संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ा देता है। जनवरी जैसे महीनों में इसका असर अस्पतालों की OPD में साफ दिखता है, जहां सांस और एलर्जी से जुड़े मरीज तेजी से बढ़ते हैं। NCAP फंड का हिसाब-किताब अभी 96 स्टेशन, 15 और लगाने की तैयारी राजस्थान में फिलहाल 96 AQI स्टेशन काम कर रहे हैं। इनमें 47 ऑटोमैटिक और 49 मैनुअल हैं। इसके बावजूद बड़े शहरों में प्रदूषण की रियल-टाइम तस्वीर अब भी अधूरी मानी जा रही है। इसी वजह से बोर्ड अब 15 नए AQI स्टेशन लगाने की तैयारी कर रहा है। इसके अंतर्गत जयपुर में 4, अलवर, खैरथल, कोटा और डीग में एक-एक स्टेशन लगाए जाएंगे। इसके अलावा कोटपूतली, उदयपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, किशनगढ़ (अजमेर), ब्यावर और सलूंबर में भी एक-एक स्टेशन का प्लान है। बोर्ड का दावा है कि इससे निगरानी बेहतर होगी और ज्यादा सटीक डेटा मिलेगा। 60% खराब AQI का कारण रोड डस्ट RSPCB के मेंबर सेक्रेट्री कपिल चंद्रावल के मुताबिक, राजस्थान के बड़े शहरों में खराब हवा के पीछे फैक्ट्री या वाहनों के धुएं से भी बड़ा कारण सड़कों की धूल और निर्माण कार्य हैं। बोर्ड के सर्वे बताते हैं कि खराब AQI का करीब 60 से 65 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ रोड डस्ट और कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी से आ रहा है। जहां सड़कें टूटी हुई हैं, मिट्टी खुली पड़ी है, निर्माण साइट्स बिना कवर चल रही हैं और पानी का छिड़काव नहीं हो रहा, वहीं सबसे ज्यादा जहरीले कण हवा में उड़ रहे हैं। बोर्ड के मुताबिक, करीब 20 प्रतिशत प्रदूषण वाहनों से, 10 प्रतिशत औद्योगिक इकाइयों से और बाकी कचरा जलाने, खुले प्लॉट और ईंट भट्टों से आता है। यानी हवा साफ करने की असली चाबी नगर निगम, PWD और विकास प्राधिकरण के हाथ में है। अगर सड़कें समय पर साफ हों, निर्माण साइट्स पर कवरिंग हो और जुर्माना वसूल हो, तो AQI में आधे से ज्यादा सुधार यहीं से आ सकता है। हकीकत यह है कि मशीन से झाड़ू, पानी का छिड़काव और साइट मॉनिटरिंग ज्यादातर फाइलों में ही सिमटी हुई है। अधिकारी बोले- सुधार आया, आंकड़े जस के तस बोर्ड के अधिकारी भले ही ‘धीरे-धीरे सुधार’ की बात कर रहे हों, लेकिन उनके अपने आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। तीन साल के डेटा में जयपुर, जोधपुर, अजमेर, अलवर और कोटा जैसे शहरों में AQI और PM2.5 अब भी राष्ट्रीय मानक से कई गुना ऊपर है। न कोई स्थायी गिरावट दिखती है, न कोई ऐसा ट्रेंड जो बताए कि हालात सच में सुधर रहे हैं। बोर्ड के सालाना औसत आंकड़े बताते हैं कि जिन शहरों में 2023 में हवा 'खराब' श्रेणी में थी, वे 2025 में भी उसी श्रेणी से बाहर नहीं निकल पाए। कुछ महीनों में अस्थायी गिरावट जरूर दिखती है, लेकिन सालाना औसत में हालात लगभग जस के तस बने हुए हैं। हर विभाग की अपनी प्राथमिकता है और जिम्मेदारी दूसरे विभागों पर डाल दी जाती है। यहीं पूरी चेन टूट जाती है। एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि हम नोटिस भेज देते हैं, लेकिन अमल करवाने वाला कोई और होता है। ऐसे में फाइलें घूमती रहती हैं और कोई ठोस कार्रवाई हो ही नहीं पाती। हालांकि अब सख्ती की है, लेकिन अभी भी काफी सुधार की गुंजाइश है। RSPCB के मेंबर सेक्रटरी कपिल चंद्रावल से पूछा कि तीन साल में करोड़ों खर्च होने के बाद भी PM2.5 क्यों नहीं घटा तो उनका जवाब था कि यह दीर्घकालिक और क्षेत्रीय प्रदूषण है, जिस पर मौसमी और भौगोलिक कारकों का असर पड़ता है। AQI स्टेशनों का नियमित रख-रखाव होता है। लेकिन मानसरोवर, रीको और मुरलीपुरा जैसे इलाकों को हाई-रिस्क जोन घोषित क्यों नहीं किया गया, इस पर कोई जवाब नहीं मिला। कितना खतरनाक है PM2.5 PM2.5 इतना बारीक होता है कि नाक-गले के सामान्य फिल्टर इसे रोक नहीं पाते। यह सीधे फेफड़ों में पहुंचकर खून में मिल जाता है। इससे दमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का कैंसर, हार्ट अटैक और स्ट्रोक तक का खतरा बढ़ जाता है। सवाई मान सिंह (SMS) हॉस्पिटल के डॉ. विशाल गुप्ता कहते हैं कि जनवरी में सांस और एलर्जी से जुड़े केस 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं। जेके लोन हॉस्पिटल के डॉ. हरिमोहन मीणा के मुताबिक, बच्चों और बुजुर्गों पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ता है। देश के 13, हमारे 3 शहर सबसे बड़े गैस चैम्बर विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 (State of Global Air 2025) के मुताबिक, विश्व की लगभग 36% आबादी ऐसी जगह रहती है, जहां हवा में धूल (PM) WHO के सुरक्षित स्तर से बहुत ज्यादा है। करीब 26 करोड़ लोग खाना पकाने के लिए लकड़ी या कोयला जलाते हुए बहुत प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं। भारत की बात करें तो दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 शहर भारत में हैं। इनमें दिल्ली, गुरुग्राम (हरियाणा) जैसे शहर सबसे खराब स्थिति में हैं। वहीं इस सूची में राजस्थान के भिवाड़ी, श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ भी शामिल हैं। इन तीनों शहरों को वैश्विक स्तर पर भी सबसे प्रदूषित शहरों में दर्ज किया गया है। इसके अलावा जयपुर, जोधपुर, अलवर, अजमेर, कोटा और बीकानेर जैसे शहरों में PM प्रदूषण का स्तर राष्ट्रीय मानक से कई गुना ऊपर रहता है। मानसून और ठंडी हवाओं के मौसम में यह और बढ़ जाता है।