बच्चे की मौत बेकार न जाए…यही मेरी लड़ाई है:हाईकोर्ट जज की डाइस पर भ्रूण रखने वाले पिता का दर्द; कहा-FIR कराने लगा रहे चक्कर
मेरी पत्नी की कोख सूनी हो गई… मेरा बच्चा मुझसे छिन गया। अगर समय रहते मेरी बात सुनी जाती, तो शायद आज मेरा बच्चा जिंदा होता… मैं बस इंसाफ चाहता हूं। यह कहना है रीवा के दयाशंकर पांडेय का। उनकी पत्नी ने सड़क हादसे से जुड़े एक हमले में गर्भ में पल रहे बच्चे को खो दिया। दयाशंकर का आरोप है कि उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट जानबूझकर कराया गया था, जिसमें उनकी गर्भवती पत्नी को गंभीर चोटें आईं हैं। इसी के कारण 6 मार्च को उनका मिसकैरेज हो गया। दयाशंकर न्याय की मांग लेकर भ्रूण के साथ हाईकोर्ट तक पहुंच गए थे। मामला सामने आने के बाद दैनिक भास्कर टीम ने दयाशंकर से बात की। उनका कहना है कि नरसिंहपुर में पत्नी का इलाज कराने के बाद, हाईकोर्ट के निर्देश पर वे रीवा में FIR दर्ज कराने पहुंचे थे, लेकिन अब तक उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… निर्दलीय प्रत्याशी दयाशंकर, अब न्याय की लड़ाई में दयाशंकर पांडेय रीवा लोकसभा सीट से साल 2024 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे थे। चुनाव में उन्हें कुल 4,610 वोट मिले और वे चौथे स्थान पर रहे। राजनीति में सक्रिय रहते हुए उन्होंने क्षेत्रीय मुद्दों को उठाने की कोशिश की, लेकिन हाल के दिनों में वे लगातार हो रहीं घटनाओं के कारण चर्चा में हैं। वर्तमान में दयाशंकर एक पारिवारिक समस्या से गुजर रहे हैं, जिसमें उनकी गर्भवती पत्नी अंजलि (26) ने एक कथित हमले के बाद अपने अजन्मे बच्चे को खो दिया। इसके अलावा वे पहले भी कई हमलों का शिकार होने का आरोप लगा चुके हैं। इन घटनाओं के बाद उनका परिवार दहशत में है और वे लगातार न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दयाशंकर का कहना है कि वे अपने परिवार के साथ हुए अन्याय के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। पहले वे चार हमले, जिसमें परिवार को निशाना बनाया फरियादी दयाशंकर पांडेय का कहना है कि उनके साथ यह कोई एक घटना नहीं है, बल्कि लगातार चार अलग-अलग घटनाओं में उन्हें और उनके परिवार को निशाना बनाया गया है। पीड़ित का कहना है कि चार-चार बार जानलेवा हमले होने के बावजूद न तो आरोपियों पर सख्त कार्रवाई हुई और न ही उन्हें सुरक्षा मिली। अब परिवार लगातार दहशत में जी रहा है और न्याय की गुहार लगा रहा है। दफनाया नहीं, जज को दिखाने के लिए सुरक्षित रखा दयाशंकर ने बताया कि घटना के बाद उन्हें थाना और पुलिस से न्याय की उम्मीद नहीं रही। ऐसे में उन्होंने अपने बच्चे के भ्रूण को नदी किनारे एक पेड़ पर पैक कर सुरक्षित टांग दिया। उन्होंने जानबूझकर उसे दफन नहीं किया, ताकि जरूरत पड़ने पर जज के सामने सबूत के रूप में पेश कर सकें। उनका कहना है कि जमीन पर रखने से जानवर उसे नुकसान पहुंचा सकते थे। उन्होंने बताया कि सबसे बड़ी चिंता यह थी कि भ्रूण को कोर्ट के अंदर कैसे ले जाएं। इसी दौरान उन्होंने देखा कि पुलिसकर्मी लापरवाही में थे, तो उन्होंने मौका देखकर भ्रूण को दस्तावेजों के साथ अंदर ले जाकर जज की टेबल पर रख दिया। जज ने हैरानी से पूछा तो दयाशंकर ने कहा, “यह मेरा बच्चा है, मुझे न्याय चाहिए।” यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोग भी स्तब्ध रह गए। कई दिनों बाद भी दर्ज नहीं हुई एफआईआर दयाशंकर का आरोप है कि घटना के कई दिन बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है। उनका कहना है कि 19 मार्च को वे यूनिवर्सिटी थाने पहुंचे, जहां उन्होंने अपना बयान दर्ज कराने और एफआईआर लिखवाने की कोशिश की, लेकिन रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। वे करीब दो घंटे तक थाने में इंतजार करते रहे, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई और उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा। दयाशंकर के अनुसार, वे तीन बार थाने जा चुके हैं, लेकिन हर बार उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। उनका कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई होती, तो शायद उनके बच्चे की जान बच सकती थी। वहीं, विश्वविद्यालय थाना पुलिस का कहना है कि मामले में पीड़िता पत्नी है, इसलिए उसके बयान अहम हैं। पत्नी के बयान के आधार पर ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। पत्नी बोली- सब कुछ एक पल में खत्म हो गया दयाशंकर की पत्नी अंजलि का कहना है- “मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा… सब कुछ एक पल में खत्म हो गया। मैंने अपने बच्चे को महसूस किया था, उसकी हर हलचल मेरी जिंदगी थी, लेकिन अब सब सूना हो गया है। उस दिन का दर्द आज भी मेरे शरीर में जिंदा है…और उससे भी ज्यादा दर्द इस बात का है कि मैं अपने बच्चे को बचा नहीं पाई। रातों को नींद नहीं आती, वही पल बार-बार आंखों के सामने आते हैं। काश, कोई हमें पहले बचा लेता, तो आज मेरा बच्चा मेरी गोद में होता…।” घर से बाहर निकलते समय भी डर लगता है दयाशंकर का कहना है कि उनका परिवार लगातार डर के साये में जी रहा है। हमें हर पल डर रहता है कि अगला हमला कब और कहां होगा। पहले धमकियां मिलीं, फिर एक के बाद एक हमले होते गए। कभी रास्ता रोककर हमला किया गया, तो कभी वाहन से टक्कर मारकर जान लेने की कोशिश की गई। अब हालत यह है कि घर से बाहर निकलते समय भी डर लगता है। हर गुजरती गाड़ी खतरा लगती है। हम जी नहीं रहे, बस डर-डर कर जिंदगी काट रहे हैं। दयाशंकर पांडे का कहना है कि वह 2018 से 2025 तक जबलपुर के शुभ मोटर मारुति शोरूम में अकाउंटेंट के रूप में कार्यरत था। इस दौरान उसे शोरूम प्रबंधन द्वारा करीब 200 करोड़ रुपए के कथित फर्जीवाड़े की जानकारी मिली। उसने वर्ष 2024 में इसकी शिकायत की, जिसके बाद से उस पर और उसके परिवार पर लगातार हमले होने लगे थे। पुलिस ने कहा- जांच के बाद होगी कार्रवाई विश्वविद्यालय थाना प्रभारी हितेंद्रनाथ शर्मा का कहना है कि मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है। उन्होंने बताया कि सभी आरोपों की पड़ताल की जा रही है और जो तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर विधि सम्मत कार्रवाई की जाएगी। हाईकोर्ट बोला- भावनात्मक आधार पर फैसला संभव नहीं हाईकोर्ट ने दयाशंकर की याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह उचित आधार पर नहीं है, इसलिए स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही है, त
मेरी पत्नी की कोख सूनी हो गई… मेरा बच्चा मुझसे छिन गया। अगर समय रहते मेरी बात सुनी जाती, तो शायद आज मेरा बच्चा जिंदा होता… मैं बस इंसाफ चाहता हूं। यह कहना है रीवा के दयाशंकर पांडेय का। उनकी पत्नी ने सड़क हादसे से जुड़े एक हमले में गर्भ में पल रहे बच्चे को खो दिया। दयाशंकर का आरोप है कि उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट जानबूझकर कराया गया था, जिसमें उनकी गर्भवती पत्नी को गंभीर चोटें आईं हैं। इसी के कारण 6 मार्च को उनका मिसकैरेज हो गया। दयाशंकर न्याय की मांग लेकर भ्रूण के साथ हाईकोर्ट तक पहुंच गए थे। मामला सामने आने के बाद दैनिक भास्कर टीम ने दयाशंकर से बात की। उनका कहना है कि नरसिंहपुर में पत्नी का इलाज कराने के बाद, हाईकोर्ट के निर्देश पर वे रीवा में FIR दर्ज कराने पहुंचे थे, लेकिन अब तक उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… निर्दलीय प्रत्याशी दयाशंकर, अब न्याय की लड़ाई में दयाशंकर पांडेय रीवा लोकसभा सीट से साल 2024 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे थे। चुनाव में उन्हें कुल 4,610 वोट मिले और वे चौथे स्थान पर रहे। राजनीति में सक्रिय रहते हुए उन्होंने क्षेत्रीय मुद्दों को उठाने की कोशिश की, लेकिन हाल के दिनों में वे लगातार हो रहीं घटनाओं के कारण चर्चा में हैं। वर्तमान में दयाशंकर एक पारिवारिक समस्या से गुजर रहे हैं, जिसमें उनकी गर्भवती पत्नी अंजलि (26) ने एक कथित हमले के बाद अपने अजन्मे बच्चे को खो दिया। इसके अलावा वे पहले भी कई हमलों का शिकार होने का आरोप लगा चुके हैं। इन घटनाओं के बाद उनका परिवार दहशत में है और वे लगातार न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दयाशंकर का कहना है कि वे अपने परिवार के साथ हुए अन्याय के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। पहले वे चार हमले, जिसमें परिवार को निशाना बनाया फरियादी दयाशंकर पांडेय का कहना है कि उनके साथ यह कोई एक घटना नहीं है, बल्कि लगातार चार अलग-अलग घटनाओं में उन्हें और उनके परिवार को निशाना बनाया गया है। पीड़ित का कहना है कि चार-चार बार जानलेवा हमले होने के बावजूद न तो आरोपियों पर सख्त कार्रवाई हुई और न ही उन्हें सुरक्षा मिली। अब परिवार लगातार दहशत में जी रहा है और न्याय की गुहार लगा रहा है। दफनाया नहीं, जज को दिखाने के लिए सुरक्षित रखा दयाशंकर ने बताया कि घटना के बाद उन्हें थाना और पुलिस से न्याय की उम्मीद नहीं रही। ऐसे में उन्होंने अपने बच्चे के भ्रूण को नदी किनारे एक पेड़ पर पैक कर सुरक्षित टांग दिया। उन्होंने जानबूझकर उसे दफन नहीं किया, ताकि जरूरत पड़ने पर जज के सामने सबूत के रूप में पेश कर सकें। उनका कहना है कि जमीन पर रखने से जानवर उसे नुकसान पहुंचा सकते थे। उन्होंने बताया कि सबसे बड़ी चिंता यह थी कि भ्रूण को कोर्ट के अंदर कैसे ले जाएं। इसी दौरान उन्होंने देखा कि पुलिसकर्मी लापरवाही में थे, तो उन्होंने मौका देखकर भ्रूण को दस्तावेजों के साथ अंदर ले जाकर जज की टेबल पर रख दिया। जज ने हैरानी से पूछा तो दयाशंकर ने कहा, “यह मेरा बच्चा है, मुझे न्याय चाहिए।” यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोग भी स्तब्ध रह गए। कई दिनों बाद भी दर्ज नहीं हुई एफआईआर दयाशंकर का आरोप है कि घटना के कई दिन बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है। उनका कहना है कि 19 मार्च को वे यूनिवर्सिटी थाने पहुंचे, जहां उन्होंने अपना बयान दर्ज कराने और एफआईआर लिखवाने की कोशिश की, लेकिन रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। वे करीब दो घंटे तक थाने में इंतजार करते रहे, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई और उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा। दयाशंकर के अनुसार, वे तीन बार थाने जा चुके हैं, लेकिन हर बार उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। उनका कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई होती, तो शायद उनके बच्चे की जान बच सकती थी। वहीं, विश्वविद्यालय थाना पुलिस का कहना है कि मामले में पीड़िता पत्नी है, इसलिए उसके बयान अहम हैं। पत्नी के बयान के आधार पर ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। पत्नी बोली- सब कुछ एक पल में खत्म हो गया दयाशंकर की पत्नी अंजलि का कहना है- “मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा… सब कुछ एक पल में खत्म हो गया। मैंने अपने बच्चे को महसूस किया था, उसकी हर हलचल मेरी जिंदगी थी, लेकिन अब सब सूना हो गया है। उस दिन का दर्द आज भी मेरे शरीर में जिंदा है…और उससे भी ज्यादा दर्द इस बात का है कि मैं अपने बच्चे को बचा नहीं पाई। रातों को नींद नहीं आती, वही पल बार-बार आंखों के सामने आते हैं। काश, कोई हमें पहले बचा लेता, तो आज मेरा बच्चा मेरी गोद में होता…।” घर से बाहर निकलते समय भी डर लगता है दयाशंकर का कहना है कि उनका परिवार लगातार डर के साये में जी रहा है। हमें हर पल डर रहता है कि अगला हमला कब और कहां होगा। पहले धमकियां मिलीं, फिर एक के बाद एक हमले होते गए। कभी रास्ता रोककर हमला किया गया, तो कभी वाहन से टक्कर मारकर जान लेने की कोशिश की गई। अब हालत यह है कि घर से बाहर निकलते समय भी डर लगता है। हर गुजरती गाड़ी खतरा लगती है। हम जी नहीं रहे, बस डर-डर कर जिंदगी काट रहे हैं। दयाशंकर पांडे का कहना है कि वह 2018 से 2025 तक जबलपुर के शुभ मोटर मारुति शोरूम में अकाउंटेंट के रूप में कार्यरत था। इस दौरान उसे शोरूम प्रबंधन द्वारा करीब 200 करोड़ रुपए के कथित फर्जीवाड़े की जानकारी मिली। उसने वर्ष 2024 में इसकी शिकायत की, जिसके बाद से उस पर और उसके परिवार पर लगातार हमले होने लगे थे। पुलिस ने कहा- जांच के बाद होगी कार्रवाई विश्वविद्यालय थाना प्रभारी हितेंद्रनाथ शर्मा का कहना है कि मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है। उन्होंने बताया कि सभी आरोपों की पड़ताल की जा रही है और जो तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर विधि सम्मत कार्रवाई की जाएगी। हाईकोर्ट बोला- भावनात्मक आधार पर फैसला संभव नहीं हाईकोर्ट ने दयाशंकर की याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह उचित आधार पर नहीं है, इसलिए स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही है, तो याचिकाकर्ता के पास अन्य कानूनी विकल्प हैं, जैसे मजिस्ट्रेट के पास जाना। भ्रूण कोर्ट में लाने पर आपत्ति जताते हुए कहा- याचिकाकर्ता ने मिसकैरेज हुए भ्रूण को कोर्ट के सामने रख दिया था। इससे न्यायालय की गरिमा प्रभावित होती है। न्याय भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि कानून और साक्ष्यों के आधार पर होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रूण को इस तरह सार्वजनिक स्थान पर लाना गैरकानूनी है। इसे बायोमेडिकल वेस्ट नियम, 2016 के अनुसार ही संभालना और निपटाना चाहिए। ऐसा करना मानव शरीर के प्रति असम्मान माना जा सकता है और दंडनीय है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को चेतावनी दी कि आगे इस तरह का व्यवहार न दोहराएं और न्यायालय में शालीनता व जिम्मेदारी के साथ पेश आएं, अन्यथा कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। संबंधित खबर भी पढ़ें… पत्नी का मिसकैरेज हुआ, भ्रूण लेकर हाईकोर्ट पहुंचा पति मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर में सोमवार को एक हैरान करने वाला मामला सामने आया। रीवा जिले का एक युवक बैग में पॉलीथिन में लिपटा भ्रूण लेकर हाईकोर्ट पहुंच गया। गेट नंबर-6 पर सुरक्षा जांच के दौरान जब सुरक्षाकर्मियों ने बैग की तलाशी ली तो उसमें भ्रूण मिला। पढ़ें पूरी खबर…