इंदौर में इंटरनेशनल सोया कॉन्क्लेव:एक्सपर्ट्स बोले- 10 साल की स्थिर आयात नीति बने; सोयाबीन की उपज दोगुनी करने पर जोर
भारत में खाद्य तेल की जरूरत का करीब 57% हिस्सा आयात से पूरा होता है। इस निर्भरता को कम करने के लिए सोयाबीन की खेती को लाभकारी बनाना, उत्पादन बढ़ाना और किसानों को उपज का उचित दाम दिलाना जरूरी है। तिलहनों की खेती से पर्याप्त लाभ नहीं मिलने पर किसान मक्का और गन्ने जैसी दूसरी फसलों की ओर रुख कर सकते हैं। ऐसे में खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा। उपभोक्ताओं को तत्काल राहत देने वाली नीतियों के कारण देश को लंबे समय का नुकसान नहीं उठाना चाहिए। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के 9वें अंतरराष्ट्रीय सोया कॉन्क्लेव में एक्सपर्ट्स ने इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कुछ ही देर में कॉन्क्लेव में शिरकत करेंगे। ‘आत्मनिर्भर भारत: तेल और प्रोटीन दृष्टि को सशक्त करना’ थीम कॉन्क्लेव में सोपा अध्यक्ष नरेश गोयनका ने कहा कि सोयाबीन देश को खाद्य तेल के साथ प्रोटीन उपलब्ध कराने वाली महत्वपूर्ण फसल है। इसके उत्पादन और प्रसंस्करण को बढ़ावा देकर किसानों की आय, पोषण सुरक्षा और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी जा सकती है। आयात शुल्क में बार-बार बदलाव से किसानों को नुकसान सोपा अध्यक्ष गोयनका ने सरकार से खाद्य तेल और तिलहनों पर 5 से 10 साल तक स्थिर आयात शुल्क नीति लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि शुल्क में बार-बार बदलाव होने से किसानों को फसल की भविष्य की कीमतों को लेकर अनिश्चितता रहती है। यदि उन्हें भरोसा हो कि सोयाबीन की खेती से लाभकारी दाम मिलेंगे, तो वे इसका रकबा बढ़ाने और बेहतर उत्पादन के लिए निवेश करने को प्रोत्साहित होंगे। उन्होंने कहा कि तिलहनों की खेती से पर्याप्त लाभ नहीं मिलने पर किसान मक्का और गन्ने जैसी दूसरी फसलों की ओर रुख कर सकते हैं। ऐसे में खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा। उपभोक्ताओं को तत्काल राहत देने वाली नीतियों के कारण देश को लंबे समय का नुकसान नहीं उठाना चाहिए। भारत में सोयाबीन की उपज वैश्विक औसत से काफी कम सोपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. डेविश जैन ने सोयाबीन की उत्पादकता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय सोयाबीन उत्पादकता मिशन शुरू करने का सुझाव दिया। उन्होंने बताया कि भारत में सोयाबीन की औसत उपज लगभग 1.1 से 1.2 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि वैश्विक औसत करीब 2.8 टन प्रति हेक्टेयर है। इस अंतर को कम करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से 100 आदर्श सोयाबीन बीज-ग्राम विकसित करने की जरूरत बताई। उन्नत बीज, वैज्ञानिक खेती, मशीनीकरण और किसानों तक आधुनिक तकनीक पहुंचाकर उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। डॉ. जैन ने कहा कि किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह भरोसा है कि फसल तैयार होने पर उसे खरीदार और उचित कीमत मिलेगी। इसके लिए प्रसंस्करण उद्योग का आर्थिक रूप से मजबूत बने रहना जरूरी है। उद्योग सक्षम होगा, तभी किसानों की उपज की मांग बनी रहेगी। नॉन-जीएम सोयामील से निर्यात बढ़ाने की संभावना कॉन्क्लेव में भारतीय नॉन-जीएम यानी गैर-आनुवंशिक रूप से संशोधित सोयामील को अंतरराष्ट्रीय बाजार में देश की विशेष ताकत बताया गया। डॉ. जैन ने कहा कि यूरोप, जापान और पूर्वी एशिया के कई बाजारों में नॉन-जीएम, टिकाऊ और उत्पाद की उत्पत्ति का पता लगाने योग्य प्रोटीन उत्पादों की मांग है। उन्होंने सरकार से भारतीय नॉन-जीएम सोयामील की अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग और प्रचार के लिए नियमित बाजार विकास सहायता (MDA) उपलब्ध कराने की मांग की। इससे कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भाग लेने, प्रमाणन हासिल करने और नए बाजार तलाशने में मदद मिल सकती है। इससे निर्यात और विदेशी मुद्रा अर्जन की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। सोयामील का 80% पशु आहार उद्योग में उपयोग डॉ. जैन के मुताबिक देश में उत्पादित सोयामील का लगभग 80% हिस्सा कुक्कुट, मत्स्य और पशु आहार उद्योग में इस्तेमाल होता है। इससे स्पष्ट है कि सोयाबीन का महत्व केवल खाद्य तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रोटीन उपलब्ध कराने और पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि सोयाबीन को पोषण, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि से जोड़कर देखने की जरूरत है। इसके उत्पादन और प्रसंस्करण में सुधार का लाभ किसानों के साथ-साथ खाद्य और पशु आहार उद्योग को भी मिलेगा। सोया से मांस के विकल्प और प्रोटीन उत्पाद बनाने पर जोर एक्सपर्ट्स ने सोयाबीन से मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने की जरूरत भी बताई। इसमें मांस के विकल्प, टेक्सचर्ड वेजिटेबल प्रोटीन (TVP), डीफैटेड सोया आटा, सोया प्रोटीन कॉन्सन्ट्रेट और आइसोलेट जैसे उत्पाद शामिल हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार कच्चे सोयाबीन और सामान्य सोयामील के अलावा इन उत्पादों के निर्माण पर ध्यान देने से उद्योग को नए बाजार मिल सकते हैं। इससे सोयाबीन का बेहतर मूल्य मिलने और किसानों तथा प्रोसेसर की आय बढ़ने की संभावना है। सोपा में किसानों और पशु आहार उद्योग की भागीदारी बढ़ाने की तैयारी सोपा अध्यक्ष नरेश गोयनका ने किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने, उत्पादकता बढ़ाने, नॉन-जीएम सोयामील के निर्यात को प्रोत्साहित करने और मूल्यवर्धन को संगठन की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया। वहीं, डॉ. जैन ने ‘सोपा 2.0’ की अवधारणा के तहत किसान उत्पादक संगठनों (FPO) और पशु आहार उद्योग को संगठन के निर्णयों में अधिक भागीदारी देने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि ये सभी सोयाबीन की मूल्य शृंखला के महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं। इसलिए उनकी जरूरतों और सुझावों को भी नीति निर्धारण में जगह मिलनी चाहिए। 12 साल तक सोपा अध्यक्ष रहे डॉ. जैन का सम्मान डॉ. डेविश जैन वर्ष 2014 से 26 सितंबर 2026 तक लगातार 12 साल सोपा के अध्यक्ष रहे। उन्हें कॉन्क्लेव से एक दिन पहले सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल में सोपा आर्थिक रूप से अधिक मजबूत और विश्वसनीय संस्था बनी है। उन्होंने अपने प
भारत में खाद्य तेल की जरूरत का करीब 57% हिस्सा आयात से पूरा होता है। इस निर्भरता को कम करने के लिए सोयाबीन की खेती को लाभकारी बनाना, उत्पादन बढ़ाना और किसानों को उपज का उचित दाम दिलाना जरूरी है। तिलहनों की खेती से पर्याप्त लाभ नहीं मिलने पर किसान मक्का और गन्ने जैसी दूसरी फसलों की ओर रुख कर सकते हैं। ऐसे में खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा। उपभोक्ताओं को तत्काल राहत देने वाली नीतियों के कारण देश को लंबे समय का नुकसान नहीं उठाना चाहिए। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के 9वें अंतरराष्ट्रीय सोया कॉन्क्लेव में एक्सपर्ट्स ने इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कुछ ही देर में कॉन्क्लेव में शिरकत करेंगे। ‘आत्मनिर्भर भारत: तेल और प्रोटीन दृष्टि को सशक्त करना’ थीम कॉन्क्लेव में सोपा अध्यक्ष नरेश गोयनका ने कहा कि सोयाबीन देश को खाद्य तेल के साथ प्रोटीन उपलब्ध कराने वाली महत्वपूर्ण फसल है। इसके उत्पादन और प्रसंस्करण को बढ़ावा देकर किसानों की आय, पोषण सुरक्षा और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी जा सकती है। आयात शुल्क में बार-बार बदलाव से किसानों को नुकसान सोपा अध्यक्ष गोयनका ने सरकार से खाद्य तेल और तिलहनों पर 5 से 10 साल तक स्थिर आयात शुल्क नीति लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि शुल्क में बार-बार बदलाव होने से किसानों को फसल की भविष्य की कीमतों को लेकर अनिश्चितता रहती है। यदि उन्हें भरोसा हो कि सोयाबीन की खेती से लाभकारी दाम मिलेंगे, तो वे इसका रकबा बढ़ाने और बेहतर उत्पादन के लिए निवेश करने को प्रोत्साहित होंगे। उन्होंने कहा कि तिलहनों की खेती से पर्याप्त लाभ नहीं मिलने पर किसान मक्का और गन्ने जैसी दूसरी फसलों की ओर रुख कर सकते हैं। ऐसे में खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा। उपभोक्ताओं को तत्काल राहत देने वाली नीतियों के कारण देश को लंबे समय का नुकसान नहीं उठाना चाहिए। भारत में सोयाबीन की उपज वैश्विक औसत से काफी कम सोपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. डेविश जैन ने सोयाबीन की उत्पादकता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय सोयाबीन उत्पादकता मिशन शुरू करने का सुझाव दिया। उन्होंने बताया कि भारत में सोयाबीन की औसत उपज लगभग 1.1 से 1.2 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि वैश्विक औसत करीब 2.8 टन प्रति हेक्टेयर है। इस अंतर को कम करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से 100 आदर्श सोयाबीन बीज-ग्राम विकसित करने की जरूरत बताई। उन्नत बीज, वैज्ञानिक खेती, मशीनीकरण और किसानों तक आधुनिक तकनीक पहुंचाकर उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। डॉ. जैन ने कहा कि किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह भरोसा है कि फसल तैयार होने पर उसे खरीदार और उचित कीमत मिलेगी। इसके लिए प्रसंस्करण उद्योग का आर्थिक रूप से मजबूत बने रहना जरूरी है। उद्योग सक्षम होगा, तभी किसानों की उपज की मांग बनी रहेगी। नॉन-जीएम सोयामील से निर्यात बढ़ाने की संभावना कॉन्क्लेव में भारतीय नॉन-जीएम यानी गैर-आनुवंशिक रूप से संशोधित सोयामील को अंतरराष्ट्रीय बाजार में देश की विशेष ताकत बताया गया। डॉ. जैन ने कहा कि यूरोप, जापान और पूर्वी एशिया के कई बाजारों में नॉन-जीएम, टिकाऊ और उत्पाद की उत्पत्ति का पता लगाने योग्य प्रोटीन उत्पादों की मांग है। उन्होंने सरकार से भारतीय नॉन-जीएम सोयामील की अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग और प्रचार के लिए नियमित बाजार विकास सहायता (MDA) उपलब्ध कराने की मांग की। इससे कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भाग लेने, प्रमाणन हासिल करने और नए बाजार तलाशने में मदद मिल सकती है। इससे निर्यात और विदेशी मुद्रा अर्जन की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। सोयामील का 80% पशु आहार उद्योग में उपयोग डॉ. जैन के मुताबिक देश में उत्पादित सोयामील का लगभग 80% हिस्सा कुक्कुट, मत्स्य और पशु आहार उद्योग में इस्तेमाल होता है। इससे स्पष्ट है कि सोयाबीन का महत्व केवल खाद्य तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रोटीन उपलब्ध कराने और पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि सोयाबीन को पोषण, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि से जोड़कर देखने की जरूरत है। इसके उत्पादन और प्रसंस्करण में सुधार का लाभ किसानों के साथ-साथ खाद्य और पशु आहार उद्योग को भी मिलेगा। सोया से मांस के विकल्प और प्रोटीन उत्पाद बनाने पर जोर एक्सपर्ट्स ने सोयाबीन से मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने की जरूरत भी बताई। इसमें मांस के विकल्प, टेक्सचर्ड वेजिटेबल प्रोटीन (TVP), डीफैटेड सोया आटा, सोया प्रोटीन कॉन्सन्ट्रेट और आइसोलेट जैसे उत्पाद शामिल हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार कच्चे सोयाबीन और सामान्य सोयामील के अलावा इन उत्पादों के निर्माण पर ध्यान देने से उद्योग को नए बाजार मिल सकते हैं। इससे सोयाबीन का बेहतर मूल्य मिलने और किसानों तथा प्रोसेसर की आय बढ़ने की संभावना है। सोपा में किसानों और पशु आहार उद्योग की भागीदारी बढ़ाने की तैयारी सोपा अध्यक्ष नरेश गोयनका ने किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने, उत्पादकता बढ़ाने, नॉन-जीएम सोयामील के निर्यात को प्रोत्साहित करने और मूल्यवर्धन को संगठन की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया। वहीं, डॉ. जैन ने ‘सोपा 2.0’ की अवधारणा के तहत किसान उत्पादक संगठनों (FPO) और पशु आहार उद्योग को संगठन के निर्णयों में अधिक भागीदारी देने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि ये सभी सोयाबीन की मूल्य शृंखला के महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं। इसलिए उनकी जरूरतों और सुझावों को भी नीति निर्धारण में जगह मिलनी चाहिए। 12 साल तक सोपा अध्यक्ष रहे डॉ. जैन का सम्मान डॉ. डेविश जैन वर्ष 2014 से 26 सितंबर 2026 तक लगातार 12 साल सोपा के अध्यक्ष रहे। उन्हें कॉन्क्लेव से एक दिन पहले सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल में सोपा आर्थिक रूप से अधिक मजबूत और विश्वसनीय संस्था बनी है। उन्होंने अपने पिता स्व. पद्मश्री डॉ. एन.एन. जैन के योगदान को याद करते हुए कहा कि सोयाबीन का विकास उनके परिवार की विरासत और आजीवन सेवा से जुड़ा विषय है। सोपा के वर्तमान अध्यक्ष नरेश गोयनका ने उनके नेतृत्व की सराहना की। उन्होंने कहा कि सरकार, उद्योग, वैज्ञानिक समुदाय और किसानों के साझा प्रयासों से ही भारत को खाद्य तेल और प्रोटीन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। कॉन्क्लेव के विभिन्न सत्रों में देश-विदेश के विशेषज्ञ सोयाबीन फसल की स्थिति, बाजार और कीमतों, वायदा कारोबार, प्रसंस्करण तकनीक तथा व्यापार नीति पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।