तोतों के पेड़ों के लिए मेट्रो स्टेशन बदलने की कवायद:3 विकल्प बताए, हर जगह अलग चुनौती; लागत 400 करोड़ तक बढ़ने का अनुमान
रानी सराय क्षेत्र के पुराने पेड़ों पर बसे तोतों और अन्य पक्षियों के आवास को बचाने के लिए प्रस्तावित मेट्रो स्टेशन को दूसरी जगह शिफ्ट करने का मामला अब प्रोजेक्ट लागत और समयसीमा से जुड़ गया है। बुधवार को हाईकोर्ट में मेट्रो कंपनी ने स्टेशन के लिए तीन वैकल्पिक स्थानों का जवाब पेश किया। कंपनी के अनुसार रीगल टॉकीज, प्रीतमलाल दुआ सभागृह और गांधी हॉल में स्टेशन शिफ्ट करना व्यावहारिक नहीं है। इन विकल्पों में जमीन अधिग्रहण, निर्माण और स्वीकृत रूट में बदलाव के चलते प्रोजेक्ट पर करीब 400 करोड़ रुपए तक का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ सकता है मेट्रो कंपनी के अनुसार रीगल टॉकीज क्षेत्र में स्टेशन बनाने के लिए मिल्की-वे परिसर के साथ करीब 5 हजार वर्गमीटर निजी जमीन की जरूरत होगी। इसके अलावा होटल, सरकारी आवास और जजों के बंगलों को हटाने की स्थिति बन सकती है। कंपनी के मुताबिक जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में ही करीब दो साल लग सकते हैं। वहीं रीगल टॉकीज की जमीन के स्वामित्व को लेकर हाईकोर्ट में मामला लंबित होने के कारण इस विकल्प से परियोजना तीन से चार साल तक प्रभावित हो सकती है। यहां स्टेशन बनाने पर करीब 100 से 150 पेड़ प्रभावित होने का अनुमान भी बताया गया है। प्रीतमलाल दुआ सभागृह में हाईकोर्ट का कामकाज भी प्रभावित होने का दावा दूसरे विकल्प के तौर पर प्रीतमलाल दुआ सभागृह क्षेत्र का उल्लेख किया गया है। मेट्रो के अनुसार यहां स्टेशन निर्माण के लिए सभागृह के अलावा महावीर स्तंभ, सिंगापुर मार्केट और अहिल्या पुस्तकालय भी प्रभावित हो सकते हैं। निर्माण के दौरान हाई कोर्ट के सामने स्थित बगीचे पर भी असर पड़ने की बात कही गई है। इसके चलते हाई कोर्ट के मेन गेट नंबर 1 और 2 को बंद रखने की स्थिति बन सकती है। करीब तीन साल के निर्माण कार्य के दौरान शोर का असर हाईकोर्ट के कामकाज पर पड़ने की आशंका भी मेट्रो ने जताई है। इसके अलावा एमजी रोड के करीब 10 से 12 मीटर हिस्से को निर्माण अवधि में बंद रखने की जरूरत पड़ सकती है। कंपनी के अनुमान के मुताबिक इस विकल्प में 250 से 300 पेड़ प्रभावित हो सकते हैं। गांधी हॉल में रूट बदलना तकनीकी चुनौती तीसरे विकल्प के रूप में गांधी हॉल परिसर पर विचार किया गया। मेट्रो कंपनी का कहना है कि यहां स्टेशन बनाने के लिए स्वीकृत रूट में बदलाव करना पड़ेगा, जो तकनीकी रूप से कठिन है। इस विकल्प में गांधी हॉल और अग्निशमन विभाग की कुछ संरचनाएं प्रभावित होने की बात कही गई है। गांधी हॉल ऐतिहासिक इमारत होने के कारण इसमें बदलाव या संरचना हटाने पर विरोध की आशंका भी कंपनी ने जताई। यहां करीब 150 से 200 पेड़ प्रभावित होने का अनुमान है। मेट्रो के अनुसार इन पुराने पेड़ों पर भी तोतों और अन्य पक्षियों का बसेरा है। 50-60 साल पुराने पेड़ों को बचाने की मांग रानी सराय के पेड़ों को बचाने की मांग का मुख्य आधार इन पेड़ों पर लंबे समय से बने पक्षी आवास हैं। पर्यावरणविद भालू मोंढे और अधिवक्ता अभिनव धनोतकर ने पूर्व में हाईकोर्ट के दो जजों को मौके पर ले जाकर इन पेड़ों पर मौजूद पक्षियों के बसेरे भी दिखाए थे। पर्यावरणविदों का तर्क है कि केवल नए पौधे लगाने से पुराने पेड़ों की भरपाई नहीं हो सकती। उनके मुताबिक 50 से 60 साल पुराने पेड़ों में पक्षियों के लिए जिस तरह की प्राकृतिक संरचनाएं और आवास विकसित हुए हैं, उन्हें नए पौधों में विकसित होने में लंबा समय लगेगा। अब लागत, समय और पर्यावरण के बीच संतुलन पर नजर मेट्रो स्टेशन की जगह बदलने के विकल्पों पर कंपनी ने जहां अतिरिक्त लागत, जमीन अधिग्रहण, निर्माण अवधि और तकनीकी दिक्कतों का हवाला दिया है, वहीं याचिकाकर्ता पक्ष पुराने पेड़ों और पक्षियों के प्राकृतिक आवास को प्राथमिकता देने की मांग कर रहा है।
रानी सराय क्षेत्र के पुराने पेड़ों पर बसे तोतों और अन्य पक्षियों के आवास को बचाने के लिए प्रस्तावित मेट्रो स्टेशन को दूसरी जगह शिफ्ट करने का मामला अब प्रोजेक्ट लागत और समयसीमा से जुड़ गया है। बुधवार को हाईकोर्ट में मेट्रो कंपनी ने स्टेशन के लिए तीन वैकल्पिक स्थानों का जवाब पेश किया। कंपनी के अनुसार रीगल टॉकीज, प्रीतमलाल दुआ सभागृह और गांधी हॉल में स्टेशन शिफ्ट करना व्यावहारिक नहीं है। इन विकल्पों में जमीन अधिग्रहण, निर्माण और स्वीकृत रूट में बदलाव के चलते प्रोजेक्ट पर करीब 400 करोड़ रुपए तक का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ सकता है मेट्रो कंपनी के अनुसार रीगल टॉकीज क्षेत्र में स्टेशन बनाने के लिए मिल्की-वे परिसर के साथ करीब 5 हजार वर्गमीटर निजी जमीन की जरूरत होगी। इसके अलावा होटल, सरकारी आवास और जजों के बंगलों को हटाने की स्थिति बन सकती है। कंपनी के मुताबिक जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में ही करीब दो साल लग सकते हैं। वहीं रीगल टॉकीज की जमीन के स्वामित्व को लेकर हाईकोर्ट में मामला लंबित होने के कारण इस विकल्प से परियोजना तीन से चार साल तक प्रभावित हो सकती है। यहां स्टेशन बनाने पर करीब 100 से 150 पेड़ प्रभावित होने का अनुमान भी बताया गया है। प्रीतमलाल दुआ सभागृह में हाईकोर्ट का कामकाज भी प्रभावित होने का दावा दूसरे विकल्प के तौर पर प्रीतमलाल दुआ सभागृह क्षेत्र का उल्लेख किया गया है। मेट्रो के अनुसार यहां स्टेशन निर्माण के लिए सभागृह के अलावा महावीर स्तंभ, सिंगापुर मार्केट और अहिल्या पुस्तकालय भी प्रभावित हो सकते हैं। निर्माण के दौरान हाई कोर्ट के सामने स्थित बगीचे पर भी असर पड़ने की बात कही गई है। इसके चलते हाई कोर्ट के मेन गेट नंबर 1 और 2 को बंद रखने की स्थिति बन सकती है। करीब तीन साल के निर्माण कार्य के दौरान शोर का असर हाईकोर्ट के कामकाज पर पड़ने की आशंका भी मेट्रो ने जताई है। इसके अलावा एमजी रोड के करीब 10 से 12 मीटर हिस्से को निर्माण अवधि में बंद रखने की जरूरत पड़ सकती है। कंपनी के अनुमान के मुताबिक इस विकल्प में 250 से 300 पेड़ प्रभावित हो सकते हैं। गांधी हॉल में रूट बदलना तकनीकी चुनौती तीसरे विकल्प के रूप में गांधी हॉल परिसर पर विचार किया गया। मेट्रो कंपनी का कहना है कि यहां स्टेशन बनाने के लिए स्वीकृत रूट में बदलाव करना पड़ेगा, जो तकनीकी रूप से कठिन है। इस विकल्प में गांधी हॉल और अग्निशमन विभाग की कुछ संरचनाएं प्रभावित होने की बात कही गई है। गांधी हॉल ऐतिहासिक इमारत होने के कारण इसमें बदलाव या संरचना हटाने पर विरोध की आशंका भी कंपनी ने जताई। यहां करीब 150 से 200 पेड़ प्रभावित होने का अनुमान है। मेट्रो के अनुसार इन पुराने पेड़ों पर भी तोतों और अन्य पक्षियों का बसेरा है। 50-60 साल पुराने पेड़ों को बचाने की मांग रानी सराय के पेड़ों को बचाने की मांग का मुख्य आधार इन पेड़ों पर लंबे समय से बने पक्षी आवास हैं। पर्यावरणविद भालू मोंढे और अधिवक्ता अभिनव धनोतकर ने पूर्व में हाईकोर्ट के दो जजों को मौके पर ले जाकर इन पेड़ों पर मौजूद पक्षियों के बसेरे भी दिखाए थे। पर्यावरणविदों का तर्क है कि केवल नए पौधे लगाने से पुराने पेड़ों की भरपाई नहीं हो सकती। उनके मुताबिक 50 से 60 साल पुराने पेड़ों में पक्षियों के लिए जिस तरह की प्राकृतिक संरचनाएं और आवास विकसित हुए हैं, उन्हें नए पौधों में विकसित होने में लंबा समय लगेगा। अब लागत, समय और पर्यावरण के बीच संतुलन पर नजर मेट्रो स्टेशन की जगह बदलने के विकल्पों पर कंपनी ने जहां अतिरिक्त लागत, जमीन अधिग्रहण, निर्माण अवधि और तकनीकी दिक्कतों का हवाला दिया है, वहीं याचिकाकर्ता पक्ष पुराने पेड़ों और पक्षियों के प्राकृतिक आवास को प्राथमिकता देने की मांग कर रहा है।