पिता की चिता को 2 वर्षीय मासूम ने दी मुखाग्नि:अंतिम संस्कार के पैसे नहीं थे, पत्नी और बेटी शव के पास बैठकर रोती रहीं
जिस उम्र में बच्चे अपने पिता का हाथ पकड़कर चलते हैं, उसी उम्र में इंदौर में एक करीब दो साल की मासूम बेटी ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। MY अस्पताल में उपचार के दौरान अर्जुन की मौत हो गई। परिवार में पत्नी और छोटी बेटी के अलावा कोई सहारा नहीं था। आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि पत्नी के पास पति के अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे। अर्जुन विजय नगर क्षेत्र में अपनी पत्नी और बेटी के साथ पन्नी बीनकर परिवार का पालन-पोषण करता था। बीमारी के चलते उसका MY अस्पताल में इलाज चल रहा था, लेकिन उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। पति की मौत के बाद पत्नी और बेटी अस्पताल में शव के पास बैठी रहीं। उनके सामने पति का शव था, लेकिन उसे अंतिम विदाई देने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे। पोस्टमार्टम के बाहर बैठी थी पत्नी, शव ले जाने तक के पैसे नहीं थे इसी दौरान मामले की जानकारी समाजसेवी अजय नागदा को मिली। सूचना मिलने पर वे MY अस्पताल पहुंचे। पोस्टमार्टम के बाहर उन्होंने अर्जुन की पत्नी से बात की। पत्नी ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है और पति की मौत के बाद वह उनका अंतिम संस्कार तक नहीं कर पा रही है। शव को मुक्तिधाम तक ले जाने और अंतिम संस्कार की व्यवस्था के लिए भी उसके पास पैसे नहीं थे। परिवार की स्थिति को देखते हुए अजय नागदा ने प्रीयु फाउंडेशन के माध्यम से मदद करने का निर्णय लिया। संस्था की मदद से अर्जुन के शव को रीजनल पार्क मुक्तिधाम ले जाया गया और अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था कराई गई। मासूम बेटी ने दी पिता को अंतिम विदाई अर्जुन के अंतिम संस्कार के दौरान वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। करीब दो साल की उसकी मासूम बेटी ने पिता को मुखाग्नि दी। छोटी सी बच्ची चिता के सामने खड़ी थी। उसे शायद यह भी पता नहीं था कि वह अपने पिता को आखिरी विदाई दे रही है। जिस उम्र में उसे पिता का हाथ पकड़कर चलना सीखना था, उसी उम्र में उसने पिता को मुखाग्नि देकर विदा किया।
जिस उम्र में बच्चे अपने पिता का हाथ पकड़कर चलते हैं, उसी उम्र में इंदौर में एक करीब दो साल की मासूम बेटी ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। MY अस्पताल में उपचार के दौरान अर्जुन की मौत हो गई। परिवार में पत्नी और छोटी बेटी के अलावा कोई सहारा नहीं था। आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि पत्नी के पास पति के अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे। अर्जुन विजय नगर क्षेत्र में अपनी पत्नी और बेटी के साथ पन्नी बीनकर परिवार का पालन-पोषण करता था। बीमारी के चलते उसका MY अस्पताल में इलाज चल रहा था, लेकिन उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। पति की मौत के बाद पत्नी और बेटी अस्पताल में शव के पास बैठी रहीं। उनके सामने पति का शव था, लेकिन उसे अंतिम विदाई देने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे। पोस्टमार्टम के बाहर बैठी थी पत्नी, शव ले जाने तक के पैसे नहीं थे इसी दौरान मामले की जानकारी समाजसेवी अजय नागदा को मिली। सूचना मिलने पर वे MY अस्पताल पहुंचे। पोस्टमार्टम के बाहर उन्होंने अर्जुन की पत्नी से बात की। पत्नी ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है और पति की मौत के बाद वह उनका अंतिम संस्कार तक नहीं कर पा रही है। शव को मुक्तिधाम तक ले जाने और अंतिम संस्कार की व्यवस्था के लिए भी उसके पास पैसे नहीं थे। परिवार की स्थिति को देखते हुए अजय नागदा ने प्रीयु फाउंडेशन के माध्यम से मदद करने का निर्णय लिया। संस्था की मदद से अर्जुन के शव को रीजनल पार्क मुक्तिधाम ले जाया गया और अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था कराई गई। मासूम बेटी ने दी पिता को अंतिम विदाई अर्जुन के अंतिम संस्कार के दौरान वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। करीब दो साल की उसकी मासूम बेटी ने पिता को मुखाग्नि दी। छोटी सी बच्ची चिता के सामने खड़ी थी। उसे शायद यह भी पता नहीं था कि वह अपने पिता को आखिरी विदाई दे रही है। जिस उम्र में उसे पिता का हाथ पकड़कर चलना सीखना था, उसी उम्र में उसने पिता को मुखाग्नि देकर विदा किया।