वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अमरकंटक में मनाया गया श्रावणी पर्व पुरोहितों-ब्राह्मणों ने मांँ नर्मदा के रामघाट में लगाई पुण्य की डुबकी, शास्त्रोक्त विधि से किया श्रावणी कर्म
अनूपपुर/ अमरकंटक / प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी रक्षाबंधन के पावन दिन अमरकंटक नर्मदा तट पर परमपूज्य संत महामंडलेश्वर श्री हरिहरानंद सरस्वती जी के सान्निध्य मे श्रावणी पर्व मनाया गया। प्रदेश के प्रमुख धार्मिक एवं आध्यात्मिक तीर्थ स्थल पवित्र नगरी अमरकंटक शुक्रवार, 28 अगस्त 26 रक्षाबंधन के दिन श्रावण पूर्णिमा एवं शतभिषा नक्षत्र के पावन संयोग में श्रावणी पर्व श्रद्धा, आस्था और वैदिक परंपराओं के अनुरूप मनाया गया। इस अवसर पर नगर के पुरोहितों, ब्राह्मणों, पंडितों एवं विप्रजनों ने पतित पावनी पुण्य सलिला मां नर्मदा के रामघाट तट पर विधि-विधानपूर्वक श्रावणी कर्म संपन्न किया। भारतीय सनातन परंपरा में श्रावण पूर्णिमा का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व माना गया है। यह दिवस वैदिक संस्कारों, ऋषि परंपरा, स्वाध्याय, संकल्प और आत्मशुद्धि से जुड़ा हुआ है। ब्राह्मण समाज द्वारा इस अवसर पर श्रावणी कर्म एवं उपाकर्म की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। वैदिक परंपरा में श्रावण पूर्णिमा को ऋषियों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने, वेदाध्ययन की पुनर्स्मृति तथा आत्मिक शुद्धि का पावन अवसर माना गया है। मां नर्मदा के पावन तट पर वैदिक परंपरा का निर्वहन श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रातःकाल से ही रामघाट पर धार्मिक वातावरण दिखाई दिया। मांँ नर्मदा के तट पर पहुंचे पुरोहितों एवं ब्राह्मणों ने सर्वप्रथम पुण्य सलिला नर्मदा का स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक स्नान किया। नर्मदा की पवित्र जलधारा में आस्था की डुबकी लगाने के बाद शास्त्रोक्त विधि से श्रावणी कर्म प्रारंभ किया गया। मान्यता है कि नदियां भारतीय संस्कृति में केवल जलधारा नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना की आधारभूमि रही हैं। वहीं अमरकंटक में मां नर्मदा का उद्गम होने के कारण नर्मदा तट का धार्मिक महत्व और भी विशिष्ट हो जाता है। यहां मां नर्मदा के तट पर किया गया स्नान, पूजन, जप, तप और धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धालुओं के लिए विशेष पुण्यदायी माना जाता है। रामघाट पर मंत्रोच्चार के साथ श्रावणी कर्म का आयोजन हुआ। वैदिक ऋचाओं एवं मंत्रों की गूंज से नर्मदा तट का वातावरण आध्यात्मिक हो उठा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्राचीन ऋषि परंपरा और वैदिक संस्कृति स्वयं मां नर्मदा के तट पर साकार हो उठी हो। सैकड़ा विप्रजनों ने लिया हिस्सा स्थानीय मृत्युंजय आश्रम के पुरोहितों एवं ब्राह्मणों सहित अनूपपुर , बिलासपुर, पेण्ड्रा, बिजुरी, शहडोल सहित अन्य नगर के बड़ी संख्या में विप्रजन इस धार्मिक आयोजन में शामिल हुए। लगभग एक सैकड़ा विप्रजनों ने श्रावणी कर्म में सहभागिता की। शांति कुटी आश्रम के प्रमुख महामंडलेश्वर स्वामी रामभूषण दास जी महाराज, मृत्युंजय आश्रम के पंडित योगेश दुबे, बिहारी लाल तिवारी, पंडित संदीप उपाध्याय सहित अनेक पुरोहित एवं विप्रजन उपस्थित रहे। रामघाट में श्रावणी कर्म का आयोजन पंडित रवि महाराज द्वारा शास्त्रोक्त विधि-विधान एवं वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न कराया गया। धार्मिक अनुष्ठान के दौरान उपस्थित ब्राह्मणों ने परंपरागत विधि से संकल्प लेकर श्रावणी कर्म किया। नर्मदा उद्गम कुंड में भी गूंजे वैदिक मंत्र श्रावणी पूर्णिमा के अवसर पर मां नर्मदा के उद्गम स्थल परिसर स्थित पवित्र नर्मदा कुंड में भी श्रावणी कर्म का आयोजन किया गया। नर्मदा मंदिर के पुजारी कामता प्रसाद द्विवेदी (नीलू महाराज) की उपस्थिति एवं नेतृत्व में ब्राह्मणों ने धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किया। इस अवसर पर उमेश द्विवेदी (बंटी महाराज), राजेश द्विवेदी (बल्लू महाराज), कमलेश द्विवेदी, जीतेंद्र द्विवेदी धर्मेंद्र द्विवेदी हर्ष द्विवेदी रूपेश द्विवेदी उत्तम द्विवेदी सहित अन्य विप्रजन उपस्थित रहे। नर्मदा उद्गम कुंड में वैदिक मंत्रोच्चार, पूजन-अर्चन एवं धार्मिक कर्मकांड के साथ श्रावणी पर्व की परंपरा निभाई गयी। ऋषि परंपरा और वेद संस्कृति से जुड़ा है श्रावणी पर्व श्रावणी पर्व भारतीय संस्कृति में गुरु, ऋषि और वेद परंपरा के प्रति कृतज्ञता का पर्व भी माना जाता है। प्राचीन काल में इसी समय ऋषि-मुनियों के आश्रमों में वेदाध्ययन एवं स्वाध्याय की परंपराओं को विशेष रूप से महत्व दिया जाता था। ब्राह्मणों के लिए यह आत्मसंस्कार, स्वाध्याय, संयम और अपने धार्मिक दायित्वों के पुनः स्मरण का अवसर रहा है। श्रावणी कर्म के माध्यम से सनातन परंपरा में यह भाव व्यक्त किया जाता है कि ज्ञान की परंपरा निरंतर चलती रहे, वेदों की वाणी पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रहे और समाज में धर्म, संस्कार एवं सदाचार की भावना बनी रहे। इसी वैदिक भावभूमि के कारण श्रावणी पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि ऋषि-स्मरण, वेद-संरक्षण, आत्मशुद्धि और सनातन संस्कारों के पुनर्स्मरण का अवसर मानी जाती है। अमरकंटक में जीवंत हुई सनातन संस्कृति श्रावण मास के अंतिम दिवस अमरकंटक में रामघाट से लेकर नर्मदा उद्गम कुंड तक धार्मिक आस्था और वैदिक परंपरा का अद्भुत संगम दिखाई दिया। एक ओर मां नर्मदा की कल-कल बहती पावन धारा, दूसरी ओर वैदिक मंत्रों की गूंज और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान—पूरे वातावरण को आध्यात्मिक बना रहे थे। पवित्र नगरी अमरकंटक में मां नर्मदा के उद्गम स्थल पर सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं के बीच श्रावणी पर्व का यह आयोजन सनातन संस्कृति की जीवंत विरासत का प्रतीक बना। ब्राह्मणों एवं पुरोहितों द्वारा परंपरागत रूप से किए गए श्रावणी कर्म ने नई पीढ़ी को भी वैदिक संस्कारों और ऋषि परंपरा से जोड़ने का संदेश दिया। मां नर्मदा के पावन तट पर श्रद्धा और वैदिक मंत्रों के मध्य संपन्न श्रावणी पर्व के साथ ही श्रावण मास का धार्मिक अनुष्ठानिक क्रम भी पूर्ण हुआ। पूरे आयोजन में धर्म, वेद, संस्कार, प्रकृति और मां नर्मदा के प्रति आस्था का सुंदर समन्वय देखने को मिला। सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित है और इस महीने की पूर्णिमा को श्रावणी पर्व मनाया जाता है। इस दिन से ही श्रावण मास का समापन माना जाता है। मुख्य रूप से इसके तीन रूप हैं: 1. श्रावणी उपाकर्म: ये ब्राह्मणों, विशेषकर जनेऊ धारण करने वालों का पर्व है। इस दिन पुराने यज्ञोपवीत को बदलकर नया जनेऊ धारण किया जाता है और वेदों के अध्ययन का नया सत्र शुरू होता है। इसे ऋषि तर्पण के नाम से भी जाना जाता है। 2. रक्षा बंधन: यही श्रावणी का सबसे लोकप्रिय रूप है। बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है और भाई जीवन भर रक्षा का वचन देता है। 3. श्रवण नक्षत्र से जुड़ा पर्व: इस पूर्णिमा पर चंद्रमा श्रवण नक्षत्र में होता है, इसलिए इसे श्रावणी कहा गया। पौराणिक महत्व मान्यता है कि श्रावण मास में समुद्र मंथन हुआ था और भगवान शिव ने विषपान किया था। इसलिए इस पूरे मास में शिव की पूजा विशेष फल देती है। इसी दिन भगवान विष्णु के अवतार हयग्रीव ने वेदों को पुनः प्राप्त किया था। अमरनाथ यात्रा भी श्रावणी पूर्णिमा पर ही संपन्न होती है। इस दिन क्या-क्या होता है? श्रावणी पर्व सिर्फ एक दिन नहीं, पूरे श्रावण मास का उत्सव है: भगवान शिव का अभिषेक: पूरे महीने शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र चढ़ाया जाता है। नाग पंचमी, हरियाली तीज, रक्षा बंधन - ये सभी त्योहार इसी मास में आते हैं और इन्हें मिलाकर ही श्रावणी पर्व कहा जाता है। कांवड़ यात्रा: शिव भक्त गंगाजल लाकर शिव का अभिषेक करते हैं। इस दिन कई जगहों पर हवन, सत्तू और जौ का दान और पितरों का तर्पण भी किया जाता है। अपने क्षेत्र में परंपरा मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के इलाके में श्रावणी पर विशेष उत्साह रहता है। इस दिन नदियों और तालाबों के किनारे मेला लगता है, बहनें अपने मायके आती हैं, और घरों में खीर-पूड़ी, सत्तू के लड्डू जैसे पारंपरिक व्यंजन बनते हैं। किसान इस दिन अच्छी फसल के लिए प्रकृति की पूजा भी करते हैं।
