32 बोर्डों पर 6 लाख खर्च, 'जनप्रतिनिधि बोर्ड' पर विवाद:नपा पर 4 गुना कीमत में खरीदने के आरोप; कांग्रेस ने “जनता के पैसे की बर्बादी” बताया
शाजापुर नगर पालिका एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। मामला “जनप्रतिनिधि बोर्ड” के नाम पर किए गए खर्च को लेकर है। जिसने पूरे शहर में राजनीतिक भूचाल ला दिया है। नपा के अनुसार 32 लोहे के बोर्डों पर करीब 6 लाख रुपए से ज्यादा खर्च किए जाने का दावा किया जा रहा है। जिसके बाद लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर यह विकास है या सरकारी खजाने की खुली लूट? जानकारी के अनुसार नगर पालिका ने हाल ही में शहर के विभिन्न वार्डों में “जनप्रतिनिधि बोर्ड” लगवाए हैं, जिन पर वार्ड पार्षदों और नगर पालिका अध्यक्ष के नाम अंकित हैं। हर बोर्ड की कीमत करीब 19 हजार रुपए से अधिक बताई जा रही है। लेकिन यही आंकड़ा अब विवाद की जड़ बन गया है। चार गुना कीमत पर बोर्ड खरीदने पर सवाल लोहे का काम करने वाले कारीगरों का कहना है कि ऐसे ही लोहे के बोर्ड बाजार में 4500 से 5500 रुपए में आसानी से तैयार हो जाते हैं। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि आखिर चार गुना अधिक कीमत क्यों चुकाई गई? क्या यह गुणवत्ता का मामला है या फिर लागत बढ़ाकर बजट का खेल? सूत्रों के मुताबिक यह पूरा काम केंद्र सरकार के ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के जरिए किया गया, जिसमें दो फर्मों ने टेंडर प्रक्रिया में भाग लिया। अंततः इंदौर की एक फर्म को यह कार्य सौंपा गया। इसके बाद पूरे शहर में ये बोर्ड लगाए गए, जिन पर जनप्रतिनिधियों के नाम बड़े आकर्षक तरीके से प्रदर्शित किए गए हैं। व्यापारी बोले- आधी कीमत में बन सकता था बोर्ड हालांकि, विवाद केवल कीमत तक सीमित नहीं है। लोहे के कारीगरों का दावा है कि इन बोर्डों का वास्तविक वजन 40 किलो है और इस हिसाब से इनकी वास्तविक लागत काफी कम बैठती है। लोहे के व्यापारी सरफराज मंसूरी का कहना है कि मौजूदा बाजार दर 60 से 70 रुपए प्रति किलो है। और ऐसे में सामग्री की लागत बहुत अधिक नहीं बनती। उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर यही काम आधी से भी कम कीमत में बेहतर गुणवत्ता के साथ किया जा सकता था।इस तरह का बोर्ड 4500 से लेकर 5500 तक बन जाता है। कांग्रेस ने “जनता के पैसे की सीधी बर्बादी” बताया इस पूरे मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। नगर पालिका अध्यक्ष भूपेन्द्र दीक्षित ने आरोपों पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि सभी कार्य नियमानुसार और प्रक्रिया के तहत किए गए हैं, और विस्तृत जानकारी संबंधित विभाग के पास उपलब्ध है। वहीं विपक्ष ने इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया है। कांग्रेस पार्षदों और नेता प्रतिपक्ष अजीत मंसूरी ने इसे “जनता के पैसे की सीधी बर्बादी” बताया है। उनका कहना है कि जब शहर की सड़कों, नालियों और बुनियादी सुविधाओं की हालत खराब है, तब इस तरह के दिखावटी बोर्डों पर लाखों रुपये खर्च करना पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना कदम है। जनता बोली-विकास कार्यों पर होना चाहिए था खर्च शहर के आम नागरिक भी इस खर्च को लेकर सवाल उठा रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि यह पैसा अगर सफाई व्यवस्था, जल आपूर्ति या सड़क सुधार में लगाया जाता तो उसका सीधा लाभ जनता को मिलता। लेकिन नाम पट्टिका बोर्डों पर इतना बड़ा खर्च समझ से परे है। अब यह मामला सिर्फ नगर पालिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन चुका है।
शाजापुर नगर पालिका एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। मामला “जनप्रतिनिधि बोर्ड” के नाम पर किए गए खर्च को लेकर है। जिसने पूरे शहर में राजनीतिक भूचाल ला दिया है। नपा के अनुसार 32 लोहे के बोर्डों पर करीब 6 लाख रुपए से ज्यादा खर्च किए जाने का दावा किया जा रहा है। जिसके बाद लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर यह विकास है या सरकारी खजाने की खुली लूट? जानकारी के अनुसार नगर पालिका ने हाल ही में शहर के विभिन्न वार्डों में “जनप्रतिनिधि बोर्ड” लगवाए हैं, जिन पर वार्ड पार्षदों और नगर पालिका अध्यक्ष के नाम अंकित हैं। हर बोर्ड की कीमत करीब 19 हजार रुपए से अधिक बताई जा रही है। लेकिन यही आंकड़ा अब विवाद की जड़ बन गया है। चार गुना कीमत पर बोर्ड खरीदने पर सवाल लोहे का काम करने वाले कारीगरों का कहना है कि ऐसे ही लोहे के बोर्ड बाजार में 4500 से 5500 रुपए में आसानी से तैयार हो जाते हैं। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि आखिर चार गुना अधिक कीमत क्यों चुकाई गई? क्या यह गुणवत्ता का मामला है या फिर लागत बढ़ाकर बजट का खेल? सूत्रों के मुताबिक यह पूरा काम केंद्र सरकार के ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के जरिए किया गया, जिसमें दो फर्मों ने टेंडर प्रक्रिया में भाग लिया। अंततः इंदौर की एक फर्म को यह कार्य सौंपा गया। इसके बाद पूरे शहर में ये बोर्ड लगाए गए, जिन पर जनप्रतिनिधियों के नाम बड़े आकर्षक तरीके से प्रदर्शित किए गए हैं। व्यापारी बोले- आधी कीमत में बन सकता था बोर्ड हालांकि, विवाद केवल कीमत तक सीमित नहीं है। लोहे के कारीगरों का दावा है कि इन बोर्डों का वास्तविक वजन 40 किलो है और इस हिसाब से इनकी वास्तविक लागत काफी कम बैठती है। लोहे के व्यापारी सरफराज मंसूरी का कहना है कि मौजूदा बाजार दर 60 से 70 रुपए प्रति किलो है। और ऐसे में सामग्री की लागत बहुत अधिक नहीं बनती। उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर यही काम आधी से भी कम कीमत में बेहतर गुणवत्ता के साथ किया जा सकता था।इस तरह का बोर्ड 4500 से लेकर 5500 तक बन जाता है। कांग्रेस ने “जनता के पैसे की सीधी बर्बादी” बताया इस पूरे मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। नगर पालिका अध्यक्ष भूपेन्द्र दीक्षित ने आरोपों पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि सभी कार्य नियमानुसार और प्रक्रिया के तहत किए गए हैं, और विस्तृत जानकारी संबंधित विभाग के पास उपलब्ध है। वहीं विपक्ष ने इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया है। कांग्रेस पार्षदों और नेता प्रतिपक्ष अजीत मंसूरी ने इसे “जनता के पैसे की सीधी बर्बादी” बताया है। उनका कहना है कि जब शहर की सड़कों, नालियों और बुनियादी सुविधाओं की हालत खराब है, तब इस तरह के दिखावटी बोर्डों पर लाखों रुपये खर्च करना पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना कदम है। जनता बोली-विकास कार्यों पर होना चाहिए था खर्च शहर के आम नागरिक भी इस खर्च को लेकर सवाल उठा रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि यह पैसा अगर सफाई व्यवस्था, जल आपूर्ति या सड़क सुधार में लगाया जाता तो उसका सीधा लाभ जनता को मिलता। लेकिन नाम पट्टिका बोर्डों पर इतना बड़ा खर्च समझ से परे है। अब यह मामला सिर्फ नगर पालिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन चुका है।