सतना में जून और जुलाई में सामान्य से कम बारिश:धान की फसल सूखने लगी, उपज 10% घटने का अनुमान

जून और जुलाई में सामान्य से कम बारिश होने से विंध्य क्षेत्र की खरीफ फसलों पर असर साफ दिखाई देने लगा है। सतना सहित पूरे रीवा संभाग में धान की खेती सबसे अधिक प्रभावित हुई है। कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार धान का रकबा और उत्पादन औसतन 10 प्रतिशत तक घट सकता है। संभाग के किसी भी जिले में धान की बोनी 80 प्रतिशत का आंकड़ा नहीं छू सकी है। इससे सबसे अधिक चिंता छोटे और सीमांत किसानों की बढ़ गई है, क्योंकि उनकी खेती पूरी तरह मानसूनी बारिश पर निर्भर है। धान की फसल पर सबसे ज्यादा असर कम बारिश का सबसे ज्यादा असर धान की खेती पर पड़ा है। सतना जिले के कोटर क्षेत्र में जिन किसानों ने धान का रोपा लगा दिया था, उनकी फसल अब बारिश नहीं होने से सूखने की कगार पर पहुंच गई है। खेतों में पर्याप्त पानी नहीं होने से किसानों को फसल खराब होने की चिंता सता रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द अच्छी बारिश नहीं हुई तो उत्पादन में और अधिक गिरावट आ सकती है। किसान बदल रहे हैं खेती का तरीका मौसम की बदलती परिस्थितियों को देखते हुए किसानों ने अब कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। तिल, उड़द, मूंग और अरहर जैसी तिलहन एवं दलहन फसलों की बोनी तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार इन फसलों का रकबा करीब 15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। किसानों का मानना है कि कम वर्षा की स्थिति में ये फसलें धान की तुलना में बेहतर विकल्प साबित हो सकती हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने पहले ही दी थी सलाह कृषि विज्ञान केंद्र मझगवां के पौध सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश जांगड़े ने बताया कि अलनीनो के प्रभाव को देखते हुए जून महीने में ही किसानों के लिए एडवाइजरी जारी कर कम पानी वाली फसलों की खेती करने की सलाह दी गई थी। उन्होंने कहा कि विंध्य क्षेत्र में मानसून की खंड वर्षा हमेशा खेती के लिए बड़ी चुनौती रही है। इसलिए मौसम की स्थिति को देखते हुए किसानों को फसल चयन में सावधानी बरतनी चाहिए। वर्षा आधारित खेती होने से बढ़ी परेशानी मौसम विज्ञानियों के अनुसार रीवा-पन्ना के पूर्वी कगारी पठार सहित विंध्य का बड़ा हिस्सा पूरी तरह मानसूनी बारिश पर निर्भर है। यहां खरीफ की 70 से 80 प्रतिशत खेती वर्षा जल के भरोसे होती है। समय पर और समान रूप से बारिश नहीं होने से धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान होता है, जबकि कम पानी वाली फसलों पर इसका असर अपेक्षाकृत कम पड़ता है। जून में 45 प्रतिशत कम बारिश इस वर्ष जून महीने में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई। सामान्य तौर पर जून में लगभग 5.25 इंच बारिश होती है, लेकिन इस बार केवल करीब 1.75 इंच वर्षा हुई। यानी जून में लगभग 45 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई। इसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुआई और शुरुआती बढ़वार पर पड़ा। जुलाई में भी नहीं हुई अच्छी बारिश जुलाई महीने में भी किसानों को अच्छी बारिश का इंतजार रहा। पूरे महीने रुक-रुककर हल्की बारिश और बूंदाबांदी होती रही, लेकिन झमाझम बारिश नहीं हुई। सामान्य रूप से जुलाई में करीब 14.5 इंच वर्षा होनी चाहिए थी, जबकि इस बार अब तक लगभग 12.5 इंच बारिश ही दर्ज की गई है। लगातार हल्की बारिश से खेतों में नमी तो बनी रही, लेकिन जलाशयों और भूजल स्तर को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो खरीफ फसलों पर इसका असर और गहरा हो सकता है।

Aug 4, 2026 - 07:11
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सतना में जून और जुलाई में सामान्य से कम बारिश:धान की फसल सूखने लगी, उपज 10% घटने का अनुमान
जून और जुलाई में सामान्य से कम बारिश होने से विंध्य क्षेत्र की खरीफ फसलों पर असर साफ दिखाई देने लगा है। सतना सहित पूरे रीवा संभाग में धान की खेती सबसे अधिक प्रभावित हुई है। कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार धान का रकबा और उत्पादन औसतन 10 प्रतिशत तक घट सकता है। संभाग के किसी भी जिले में धान की बोनी 80 प्रतिशत का आंकड़ा नहीं छू सकी है। इससे सबसे अधिक चिंता छोटे और सीमांत किसानों की बढ़ गई है, क्योंकि उनकी खेती पूरी तरह मानसूनी बारिश पर निर्भर है। धान की फसल पर सबसे ज्यादा असर कम बारिश का सबसे ज्यादा असर धान की खेती पर पड़ा है। सतना जिले के कोटर क्षेत्र में जिन किसानों ने धान का रोपा लगा दिया था, उनकी फसल अब बारिश नहीं होने से सूखने की कगार पर पहुंच गई है। खेतों में पर्याप्त पानी नहीं होने से किसानों को फसल खराब होने की चिंता सता रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द अच्छी बारिश नहीं हुई तो उत्पादन में और अधिक गिरावट आ सकती है। किसान बदल रहे हैं खेती का तरीका मौसम की बदलती परिस्थितियों को देखते हुए किसानों ने अब कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। तिल, उड़द, मूंग और अरहर जैसी तिलहन एवं दलहन फसलों की बोनी तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार इन फसलों का रकबा करीब 15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। किसानों का मानना है कि कम वर्षा की स्थिति में ये फसलें धान की तुलना में बेहतर विकल्प साबित हो सकती हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने पहले ही दी थी सलाह कृषि विज्ञान केंद्र मझगवां के पौध सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश जांगड़े ने बताया कि अलनीनो के प्रभाव को देखते हुए जून महीने में ही किसानों के लिए एडवाइजरी जारी कर कम पानी वाली फसलों की खेती करने की सलाह दी गई थी। उन्होंने कहा कि विंध्य क्षेत्र में मानसून की खंड वर्षा हमेशा खेती के लिए बड़ी चुनौती रही है। इसलिए मौसम की स्थिति को देखते हुए किसानों को फसल चयन में सावधानी बरतनी चाहिए। वर्षा आधारित खेती होने से बढ़ी परेशानी मौसम विज्ञानियों के अनुसार रीवा-पन्ना के पूर्वी कगारी पठार सहित विंध्य का बड़ा हिस्सा पूरी तरह मानसूनी बारिश पर निर्भर है। यहां खरीफ की 70 से 80 प्रतिशत खेती वर्षा जल के भरोसे होती है। समय पर और समान रूप से बारिश नहीं होने से धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान होता है, जबकि कम पानी वाली फसलों पर इसका असर अपेक्षाकृत कम पड़ता है। जून में 45 प्रतिशत कम बारिश इस वर्ष जून महीने में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई। सामान्य तौर पर जून में लगभग 5.25 इंच बारिश होती है, लेकिन इस बार केवल करीब 1.75 इंच वर्षा हुई। यानी जून में लगभग 45 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई। इसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुआई और शुरुआती बढ़वार पर पड़ा। जुलाई में भी नहीं हुई अच्छी बारिश जुलाई महीने में भी किसानों को अच्छी बारिश का इंतजार रहा। पूरे महीने रुक-रुककर हल्की बारिश और बूंदाबांदी होती रही, लेकिन झमाझम बारिश नहीं हुई। सामान्य रूप से जुलाई में करीब 14.5 इंच वर्षा होनी चाहिए थी, जबकि इस बार अब तक लगभग 12.5 इंच बारिश ही दर्ज की गई है। लगातार हल्की बारिश से खेतों में नमी तो बनी रही, लेकिन जलाशयों और भूजल स्तर को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो खरीफ फसलों पर इसका असर और गहरा हो सकता है।