एक अंक से फेल मेडिकल छात्र ने मांगा ग्रेस मार्क:हाईकोर्ट ने कहा-ग्रेस मार्क्स देना कानूनी आधार नहीं; एनाटॉमी विषय का है छात्र

ग्वालियर के गजरा राजा मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्र राम नरेश कुशवाहा एनाटॉमी विषय में एक अंक से फेल हो गए। पूरक परीक्षा में उन्हें 32 अंक मिले थे। उन्होंने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर कर उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन के साथ एक अंक ग्रेस के तौर पर देने की मांग की थी। छात्र का कहना था कि 33 अंक होने पर वह सेकंड प्रोफेशनल की कक्षाओं में शामिल हो सकेगा और उसका एक शैक्षणिक वर्ष बच जाएगा। NMC नियमों में ग्रेस मार्क्स का प्रावधान नहीं गुरुवार को जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) की गाइडलाइंस में मेडिकल परीक्षा में ग्रेस मार्क्स देने का प्रावधान नहीं है। ऐसे में विश्वविद्यालय को छात्र को एक अंक ग्रेस देने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। क्लॉज 32 का दिया था हवाला छात्र ने मध्यप्रदेश यूनिवर्सिटीज ऑर्डिनेंस के क्लॉज 32 का हवाला देते हुए कहा था कि विश्वविद्यालय के कुलपति उसे एक ग्रेस मार्क दे सकते हैं। उसका तर्क था कि एक अंक मिलने से वह 33 अंक हासिल कर लेगा और पूरा शैक्षणिक वर्ष बर्बाद होने से बच जाएगा। छात्र ने अपनी मांग के समर्थन में भोपाल के एक अन्य मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर की राय भी पेश की थी, जिसमें एक अंक देने की सिफारिश की गई थी। दूसरे कॉलेज के प्रोफेसर की राय भी आधार नहीं हाईकोर्ट ने कहा कि किसी अन्य मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर की व्यक्तिगत राय के आधार पर ग्रेस मार्क्स देने का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने माना कि एक अंक की कमी और शैक्षणिक वर्ष बचाने की दलील अपने आप में ग्रेस मार्क देने का कानूनी आधार नहीं है। विश्वविद्यालय को नियमों के खिलाफ राहत का निर्देश नहीं छात्र ने मध्यप्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर को पक्षकार बनाते हुए याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जान्हवी पंडित और मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी की ओर से अधिवक्ता नीरज सिंह चौहान ने पक्ष रखा। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि जब NMC की गाइडलाइंस में ग्रेस मार्क्स की अनुमति नहीं है, तो विश्वविद्यालय को ऐसा करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। इसी आधार पर डिवीजन बेंच ने याचिका को सारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।

Oct 3, 2026 - 08:42
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एक अंक से फेल मेडिकल छात्र ने मांगा ग्रेस मार्क:हाईकोर्ट ने कहा-ग्रेस मार्क्स देना कानूनी आधार नहीं; एनाटॉमी विषय का है छात्र
ग्वालियर के गजरा राजा मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्र राम नरेश कुशवाहा एनाटॉमी विषय में एक अंक से फेल हो गए। पूरक परीक्षा में उन्हें 32 अंक मिले थे। उन्होंने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर कर उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन के साथ एक अंक ग्रेस के तौर पर देने की मांग की थी। छात्र का कहना था कि 33 अंक होने पर वह सेकंड प्रोफेशनल की कक्षाओं में शामिल हो सकेगा और उसका एक शैक्षणिक वर्ष बच जाएगा। NMC नियमों में ग्रेस मार्क्स का प्रावधान नहीं गुरुवार को जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) की गाइडलाइंस में मेडिकल परीक्षा में ग्रेस मार्क्स देने का प्रावधान नहीं है। ऐसे में विश्वविद्यालय को छात्र को एक अंक ग्रेस देने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। क्लॉज 32 का दिया था हवाला छात्र ने मध्यप्रदेश यूनिवर्सिटीज ऑर्डिनेंस के क्लॉज 32 का हवाला देते हुए कहा था कि विश्वविद्यालय के कुलपति उसे एक ग्रेस मार्क दे सकते हैं। उसका तर्क था कि एक अंक मिलने से वह 33 अंक हासिल कर लेगा और पूरा शैक्षणिक वर्ष बर्बाद होने से बच जाएगा। छात्र ने अपनी मांग के समर्थन में भोपाल के एक अन्य मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर की राय भी पेश की थी, जिसमें एक अंक देने की सिफारिश की गई थी। दूसरे कॉलेज के प्रोफेसर की राय भी आधार नहीं हाईकोर्ट ने कहा कि किसी अन्य मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर की व्यक्तिगत राय के आधार पर ग्रेस मार्क्स देने का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने माना कि एक अंक की कमी और शैक्षणिक वर्ष बचाने की दलील अपने आप में ग्रेस मार्क देने का कानूनी आधार नहीं है। विश्वविद्यालय को नियमों के खिलाफ राहत का निर्देश नहीं छात्र ने मध्यप्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर को पक्षकार बनाते हुए याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जान्हवी पंडित और मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी की ओर से अधिवक्ता नीरज सिंह चौहान ने पक्ष रखा। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि जब NMC की गाइडलाइंस में ग्रेस मार्क्स की अनुमति नहीं है, तो विश्वविद्यालय को ऐसा करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। इसी आधार पर डिवीजन बेंच ने याचिका को सारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।