जबलपुर आयुर्विज्ञान यूनिवर्सिटी विखंडन पर प्रदर्शन:जनसंगठनों ने प्रभारी मंत्री से इस्तीफे की मांग की, जोरदार नारेबाजी हुई
मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के विखंडन संबंधी संशोधन प्रस्ताव को राज्य कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद जबलपुर में विरोध तेज हो गया है। प्रस्ताव के तहत जबलपुर स्थित विश्वविद्यालय का दायरा सीमित कर उज्जैन में नई मेडिकल यूनिवर्सिटी स्थापित करने की तैयारी की जा रही है। इस फैसले के विरोध में सामाजिक संगठन नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच सहित विभिन्न जनसंगठनों ने शुक्रवार दोपहर शहर के ऐतिहासिक घंटाघर पर प्रदर्शन कर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जबलपुर से मेडिकल शिक्षा का केंद्रीय नियंत्रण हटाना शहर की शैक्षणिक पहचान और गौरव पर सीधा आघात है। उनका आरोप है कि इससे मध्य प्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य बन जाएगा, जहां एक स्थापित और एकीकृत मेडिकल यूनिवर्सिटी का विखंडन किया जा रहा है। यूनिवर्सिटी का स्वरूप छोटा होगा, व्यवस्था प्रभावित होगी आंदोलनकारियों का कहना है कि विश्वविद्यालय का दायरा सीमित होने से परीक्षा संचालन, पाठ्यक्रमों के प्रबंधन, शोध गतिविधियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और समन्वय भी प्रभावित होने की आशंका है। जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल प्रदर्शन के दौरान नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के पीजी नाजपांडे ने महाकौशल क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों की चुप्पी पर सवाल उठाए। उन्होंने जबलपुर के जिला प्रभारी मंत्री एवं उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह, राजेंद्र शुक्ला और प्रहलाद पटेल का नाम लेते हुए कहा कि शहर के हितों के इस मुद्दे पर उनका मौन लोगों को निराश कर रहा है। नाजपांडे ने कहा कि यदि प्रभारी मंत्री जबलपुर के अधिकारों और हितों की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं तथा शहर को उनका कोई लाभ नहीं मिल रहा है, तो उन्हें नैतिकता के आधार पर अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। आंदोलन तेज करने की चेतावनी प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया तो आंदोलन को और व्यापक एवं उग्र रूप दिया जाएगा। जनसंगठनों का कहना है कि उन्हें प्रदेश के अन्य शहरों में नई मेडिकल यूनिवर्सिटी स्थापित करने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसके लिए जबलपुर स्थित ऐतिहासिक संस्थान का स्वरूप छोटा करना उचित नहीं है। उनका कहना है कि इससे न केवल शहर की शैक्षणिक पहचान प्रभावित होगी, बल्कि विद्यार्थियों और चिकित्सा शिक्षा की साख पर भी असर पड़ेगा।
मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के विखंडन संबंधी संशोधन प्रस्ताव को राज्य कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद जबलपुर में विरोध तेज हो गया है। प्रस्ताव के तहत जबलपुर स्थित विश्वविद्यालय का दायरा सीमित कर उज्जैन में नई मेडिकल यूनिवर्सिटी स्थापित करने की तैयारी की जा रही है। इस फैसले के विरोध में सामाजिक संगठन नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच सहित विभिन्न जनसंगठनों ने शुक्रवार दोपहर शहर के ऐतिहासिक घंटाघर पर प्रदर्शन कर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जबलपुर से मेडिकल शिक्षा का केंद्रीय नियंत्रण हटाना शहर की शैक्षणिक पहचान और गौरव पर सीधा आघात है। उनका आरोप है कि इससे मध्य प्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य बन जाएगा, जहां एक स्थापित और एकीकृत मेडिकल यूनिवर्सिटी का विखंडन किया जा रहा है। यूनिवर्सिटी का स्वरूप छोटा होगा, व्यवस्था प्रभावित होगी आंदोलनकारियों का कहना है कि विश्वविद्यालय का दायरा सीमित होने से परीक्षा संचालन, पाठ्यक्रमों के प्रबंधन, शोध गतिविधियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और समन्वय भी प्रभावित होने की आशंका है। जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल प्रदर्शन के दौरान नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के पीजी नाजपांडे ने महाकौशल क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों की चुप्पी पर सवाल उठाए। उन्होंने जबलपुर के जिला प्रभारी मंत्री एवं उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह, राजेंद्र शुक्ला और प्रहलाद पटेल का नाम लेते हुए कहा कि शहर के हितों के इस मुद्दे पर उनका मौन लोगों को निराश कर रहा है। नाजपांडे ने कहा कि यदि प्रभारी मंत्री जबलपुर के अधिकारों और हितों की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं तथा शहर को उनका कोई लाभ नहीं मिल रहा है, तो उन्हें नैतिकता के आधार पर अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। आंदोलन तेज करने की चेतावनी प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया तो आंदोलन को और व्यापक एवं उग्र रूप दिया जाएगा। जनसंगठनों का कहना है कि उन्हें प्रदेश के अन्य शहरों में नई मेडिकल यूनिवर्सिटी स्थापित करने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसके लिए जबलपुर स्थित ऐतिहासिक संस्थान का स्वरूप छोटा करना उचित नहीं है। उनका कहना है कि इससे न केवल शहर की शैक्षणिक पहचान प्रभावित होगी, बल्कि विद्यार्थियों और चिकित्सा शिक्षा की साख पर भी असर पड़ेगा।