एमपी का लिवर ट्रांसप्लांट में देश में 9वां स्थान:मरीज अब भी दिल्ली-चेन्नई के भरोसे, 'डोनर' की कमी सबसे बड़ी चुनौती

मध्यप्रदेश में लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद बड़ी संख्या में मरीज आज भी इलाज के लिए दिल्ली, चेन्नई और मुंबई का रुख कर रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह डोनर अंगदान की कमजोर व्यवस्था और लोगों में जागरूकता की कमी है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि यदि प्रदेश में अंगदान की रफ्तार बढ़े और सरकार आर्थिक सहयोग का दायरा बढ़ाए तो हजारों मरीजों को अपने ही प्रदेश में कम खर्च में बेहतर इलाज मिल सकता है। यह बात 'गैस्ट्रो अपडेट 2.0 और आईएसजी इंदौर-2026' सम्मेलन में लिवर रोग एक्सपर्ट्स ने कही। कॉन्फ्रेंस में फैटी लिवर, लिवर सिरोसिस, लिवर ट्रांसप्लांट और आधुनिक उपचार तकनीकों पर विस्तार से चर्चा हुई। मध्य प्रदेश अभी काफी पीछे डॉ. अरुण सिंह भदौरिया (लिवर एक्सपर्ट, मेदांता हॉस्पिटल) ने बताया कि देश में सबसे ज्यादा लिवर ट्रांसप्लांट दिल्ली-एनसीआर में होते हैं। दूसरे स्थान पर तमिलनाडु (चेन्नई) और तीसरे स्थान पर महाराष्ट्र है। इसके मुकाबले मध्य प्रदेश अभी आठवें-नौवें स्थान पर है। उन्होंने कहा कि पहले लोगों को लगता था कि प्रदेश में लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध नहीं है, लेकिन अब इंदौर और भोपाल में नियमित रूप से लिवर ट्रांसप्लांट किए जा रहे हैं। यहां सफलता दर भी देश के बड़े केंद्रों के बराबर है और इलाज का खर्च दिल्ली व मुंबई की तुलना में कम है। सबसे बड़ी चुनौती- अंगदान करने वाले कम डॉ. भदौरिया ने कहा कि प्रदेश में सबसे बड़ी समस्या मृतक के अंगदान (Deceased Donor) की कमजोर स्थिति है। ब्रेन डेड मरीजों के परिजनों द्वारा अंगदान की संख्या अभी बहुत कम है। यही कारण है कि अधिकांश मरीजों को लिविंग डोनर यानी परिवार के सदस्य पर निर्भर रहना पड़ता है दक्षिण भारत में मृतक अंगदान की व्यवस्था काफी मजबूत है, इसलिए वहां लिवर ट्रांसप्लांट की संख्या भी अधिक है। मध्य भारत में इस दिशा में अभी काफी काम किए जाने की जरूरत है। प्रदेश में बढ़ रहे लिवर रोग डॉ. सुनील जैन के अनुसार मध्य भारत में फैटी लिवर, मोटापा, शराब का बढ़ता सेवन, वायरल हेपेटाइटिस और बीमारी के कारण पेट और लिवर की गंभीर बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। समय पर इलाज नहीं मिलने पर कई मरीजों को अंततः लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। एक्सपर्ट्स ने बताया कि फैटी लिवर को पहले सामान्य बीमारी माना जाता था, लेकिन अब यह लिवर सिरोसिस और लिवर फेल्योर का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। इसलिए शुरुआती स्तर पर इसकी पहचान और जीवनशैली में सुधार बेहद जरूरी है। लाखों रुपए बच सकते हैं एक्सपर्ट्स का कहना है लिवर ट्रांसप्लांट पर सामान्यतः करीब 20 लाख रुपए तक खर्च आता है। आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए इतनी राशि जुटाना मुश्किल होता है। यदि सरकार और सामाजिक संस्थाएं सहयोग बढ़ाएं तो अधिक मरीजों की जान बचाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि पहले एडवांस एंडोस्कोपिक प्रक्रियाओं और लिवर संबंधी जटिल इलाज के लिए मरीजों को हैदराबाद, गुरुग्राम या मुंबई जाना पड़ता था, लेकिन अब इंदौर में भी कई आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। इससे मरीजों का खर्च कम हुआ है और उन्हें अपने ही शहर में इलाज मिल रहा है। उनका मानना है कि इंदौर और भोपाल जैसे शहर भविष्य में मध्य भारत के प्रमुख लिवर ट्रांसप्लांट सेंटर बन सकते हैं, बशर्ते अंगदान को जनआंदोलन बनाया जाए।

Aug 4, 2026 - 07:11
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एमपी का लिवर ट्रांसप्लांट में देश में 9वां स्थान:मरीज अब भी दिल्ली-चेन्नई के भरोसे, 'डोनर' की कमी सबसे बड़ी चुनौती
मध्यप्रदेश में लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद बड़ी संख्या में मरीज आज भी इलाज के लिए दिल्ली, चेन्नई और मुंबई का रुख कर रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह डोनर अंगदान की कमजोर व्यवस्था और लोगों में जागरूकता की कमी है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि यदि प्रदेश में अंगदान की रफ्तार बढ़े और सरकार आर्थिक सहयोग का दायरा बढ़ाए तो हजारों मरीजों को अपने ही प्रदेश में कम खर्च में बेहतर इलाज मिल सकता है। यह बात 'गैस्ट्रो अपडेट 2.0 और आईएसजी इंदौर-2026' सम्मेलन में लिवर रोग एक्सपर्ट्स ने कही। कॉन्फ्रेंस में फैटी लिवर, लिवर सिरोसिस, लिवर ट्रांसप्लांट और आधुनिक उपचार तकनीकों पर विस्तार से चर्चा हुई। मध्य प्रदेश अभी काफी पीछे डॉ. अरुण सिंह भदौरिया (लिवर एक्सपर्ट, मेदांता हॉस्पिटल) ने बताया कि देश में सबसे ज्यादा लिवर ट्रांसप्लांट दिल्ली-एनसीआर में होते हैं। दूसरे स्थान पर तमिलनाडु (चेन्नई) और तीसरे स्थान पर महाराष्ट्र है। इसके मुकाबले मध्य प्रदेश अभी आठवें-नौवें स्थान पर है। उन्होंने कहा कि पहले लोगों को लगता था कि प्रदेश में लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध नहीं है, लेकिन अब इंदौर और भोपाल में नियमित रूप से लिवर ट्रांसप्लांट किए जा रहे हैं। यहां सफलता दर भी देश के बड़े केंद्रों के बराबर है और इलाज का खर्च दिल्ली व मुंबई की तुलना में कम है। सबसे बड़ी चुनौती- अंगदान करने वाले कम डॉ. भदौरिया ने कहा कि प्रदेश में सबसे बड़ी समस्या मृतक के अंगदान (Deceased Donor) की कमजोर स्थिति है। ब्रेन डेड मरीजों के परिजनों द्वारा अंगदान की संख्या अभी बहुत कम है। यही कारण है कि अधिकांश मरीजों को लिविंग डोनर यानी परिवार के सदस्य पर निर्भर रहना पड़ता है दक्षिण भारत में मृतक अंगदान की व्यवस्था काफी मजबूत है, इसलिए वहां लिवर ट्रांसप्लांट की संख्या भी अधिक है। मध्य भारत में इस दिशा में अभी काफी काम किए जाने की जरूरत है। प्रदेश में बढ़ रहे लिवर रोग डॉ. सुनील जैन के अनुसार मध्य भारत में फैटी लिवर, मोटापा, शराब का बढ़ता सेवन, वायरल हेपेटाइटिस और बीमारी के कारण पेट और लिवर की गंभीर बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। समय पर इलाज नहीं मिलने पर कई मरीजों को अंततः लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। एक्सपर्ट्स ने बताया कि फैटी लिवर को पहले सामान्य बीमारी माना जाता था, लेकिन अब यह लिवर सिरोसिस और लिवर फेल्योर का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। इसलिए शुरुआती स्तर पर इसकी पहचान और जीवनशैली में सुधार बेहद जरूरी है। लाखों रुपए बच सकते हैं एक्सपर्ट्स का कहना है लिवर ट्रांसप्लांट पर सामान्यतः करीब 20 लाख रुपए तक खर्च आता है। आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए इतनी राशि जुटाना मुश्किल होता है। यदि सरकार और सामाजिक संस्थाएं सहयोग बढ़ाएं तो अधिक मरीजों की जान बचाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि पहले एडवांस एंडोस्कोपिक प्रक्रियाओं और लिवर संबंधी जटिल इलाज के लिए मरीजों को हैदराबाद, गुरुग्राम या मुंबई जाना पड़ता था, लेकिन अब इंदौर में भी कई आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। इससे मरीजों का खर्च कम हुआ है और उन्हें अपने ही शहर में इलाज मिल रहा है। उनका मानना है कि इंदौर और भोपाल जैसे शहर भविष्य में मध्य भारत के प्रमुख लिवर ट्रांसप्लांट सेंटर बन सकते हैं, बशर्ते अंगदान को जनआंदोलन बनाया जाए।